हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। - छविनाथ पांडेय।

मेरे देश का एक बूढ़ा कवि

मेरे देश का एक बूढ़ा कवि | Hindi Poem by Abbas Raza Alvi

फटे हुए लिबास में क़तार में खड़ा हुआ
उम्र के झुकाओ में आस से जुड़ा हुआ
किताब हाथ में लिये भीड़ से भिड़ा हुआ
कोई सुने या न सुने आन पे अड़ा हुआ

आँखें कुछ धँसी हुई थीं, हाथ थरथरा रहे थे
होंट कुछ फटे हुए थे, पैर डगमगा रहे थे
गिड़गिड़ाते लड़खड़ाते अपने हाथ भींचकर
आँख में आँसू लिये कह रहा था चीख़कर

जला रहे हो तुम जिसे मिटा रहे हो तुम जिसे
यह मेरा है, यह तेरा है, यह अपना देश है
हाँ , यह सबका देश है

-अब्बास रज़ा अल्वी, ऑस्ट्रेलिया

 

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