देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

मौज-मस्ती के पल भी आएंगे | ग़ज़ल

रचनाकार: राजगोपाल सिंह
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मौज-मस्ती के पल भी आएंगे - राजगोपाल सिंह की ग़ज़ल | Hindi Ghazal by Rajgopal Singh

मौज-मस्ती के पल भी आएंगे
पेड़ होंगे तो फल भी आएंगे

आज की रात मुझको जी ले तू
चांद-तारे तो कल भी आएंगे

चाहतें दोस्ती की पैदा कर
रास्ते तो निकल भी आएंगे

आइने लाए जाएंगे जब तक
लोग चेहरे बदल भी आएंगे

अजनबी बादलों से क्या उम्मीद
आए तो ले के जल भी आएंगे

- राजगोपाल सिंह

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