कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली 'मीर'।

मरा हूँ हज़ार मरण

मरा हूँ हज़ार मरण 
पाई तब चरण-शरण। 
फैला जो तिमिर-जाल 
कट-कटकर रहा काल, 

अँसुओं के अंशुमाल, 
पड़े अमित सिताभरण। 

जल-कलकल-नाद बढ़ा, 
अंतर्हित हर्ष कढ़ा, 
विश्व उसी को उमड़ा, 
हुए चारु-करण सरण। 

-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।