नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।

मंदिर-दीप

मंदिर-दीप | Geet by Sohanlal Dwivedi

मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।
जैसे चाहो, इसे जलाओ,
जैसे चाहो, इसे बुझायो,

इसमें क्या अधिकार हमारा?
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

जस करेगा, ज्योति करेगा,
जीवन-पथ का तिमिर हरेगा,

होगा पथ का एक सहारा!
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

बिना स्नेह यह जल न सकेगा,
अधिक दिवस यह चल न सकेगा,

भरे रहो इसमें मधुधारा,
मैं मंदिर का दीप तुम्हारा।

- सोहनलाल द्विवेदी

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