अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

मन की आँखें खोल

मन की आँखें खोल - सुदर्शन | Geet by Sudershan

बाबा, मन की आँखें खोल!
दुनिया क्या है खेल-तमाशा,
चार दिनों की झूठी आशा,
पल में तोला, पल में माशा,
ज्ञान-तराजू लेके हाथ में---
तोल सके तो तोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

झूठे हैं सब दुनियावाले,
तन के उजले मनके काले,
इनसे अपना आप बचा ले,
रीत कहाँ की प्रीत कहाँ की---
कैसा प्रेम-किलोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

नींद में माल गँवा बैठेगा,
मन की जोत बुझा बैठेगा,
अपना आप लुटा बैठेगा,
दो दिन की दुनिया में प्यारे--
पल पल है अनमोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

मतलब की यह दुनियादारी,
मतलब के सारे संसारी,
तेरा जग में को हितकारी?
तन-मन का सब ज़ोर लगाकर---
नाम हरी का बोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!

-सुदर्शन

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