भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

दर्द के पैबंद | ग़ज़ल

मखमली चादर के नीचे | Ghazal by Rekha Rajvanshi

मखमली चादर के नीचे दर्द के पैबंद हैं
आपसी रिश्तों के पीछे भी कई अनुबंध हैं।

दोस्त बन दुश्मन मिले किसका भरोसा कीजिए
मित्र अपनी साँस पर भी अब यहाँ प्रतिबंध है।

तोड़ औरों के घरौंदे घर बसा बैठे हैं लोग
फिर शिकायत कर रहे क्यों टूटते संबंध हैं।

दूसरों पर पाँव रखकर चढ़ रहे हैं सीढ़ियाँ
और कहते हैं उसूलों के बहुत पाबंद हैं।

दिन ज़रा अच्छे हुए तो आसमाँ छूने लगे
अब गरीबों के लिए घर-बार उनके बंद हैं।

-रेखा राजवंशी, ऑस्ट्रेलिया

[साभार: कंगारुओं के देश में, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली] 

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