राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

मैं और कुछ नहीं कर सकता था

मैं और कुछ नहीं कर सकता था | Hindi poem by Vishnu Nagar

मैं क्या कर सकता था
किसी का बेटा मर गया था
सांत्वना के दो शब्द कह सकता था
किसी ने कहा बाबू जी मेरा घर बाढ़ में बह गया
तो उस पर यकीन करके उसे दस रुपये दे सकता था
किसी अंधे को सड़क पार करा सकता था
रिक्शावाले से भाव न करके उसे मुंहमांगा दाम दे सकता था
अपनी कामवाली को दो महीने का एडवांस दे सकता था
दफ्तर के चपरासी की ग़लती माफ़ कर सकता था
अमेरिका के खिलाफ नारे लगा सकता था
वामपंथ में अपना भरोसा फिर से ज़ाहिर कर सकता था
वक्तव्य पर दस्तख़त कर सकता था

और मैं क्या कर सकता था
किसी का बेटा तो नहीं बन सकता था
किसी का घर तो बना कर नहीं दे सकता था
किसी की आँख तो नहीं बन सकता था
रिक्शा चलाने से किसी के फेफड़ों को सड़ने से रोक तो नहीं सकता था

और मैं क्या कर सकता था-
ऐसे सवाल उठा कर खुश हो सकता था
मान सकता था कि अब तो सिद्ध है वाकई मैं एक कवि हूँ
और वक़्त आ चुका है कि मेरी कविताओं के अनुवाद की किताब अब
अंग्रेजी में लंदन से छप कर आ जाना चाहिए।

- विष्णु नागर
[हँसने की तरह रोना]

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