"नमस्ते कमाल साहब! मुझे राघव कहते हैं।
"जी, नमस्कार ! क्या सेवा करूँ...पूछ सकता हूँ?"
"किसान हूँ साहब! कागज के खेत को कलम से जोतता हूँ, शब्द बोता हूँ, और..."
"समझ गया, समझ गया ! सेवा बताइए।"
"आप तो 'आढ़ती' हैं शब्दों के...।"
"हैं तो; लेकिन... अपना माल आप कितना खुद उठा लोगे और कितना दूसरों को उठवा दोगे-यह हैसियत बताइए और जब चाहें तब, कागजों के वजन बराबर रकम साथ में लेकर आ जाइए।"
—बलराम अग्रवाल
[तैरती हैं पत्तियाँ, अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली]
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