भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

धूमिल की अंतिम कविता

धूमिल की अंतिम कविता | The last poem of Dhoomil

"शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।"

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है।

-धूमिल

 

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