देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

गणेशशंकर विद्यार्थी का अंतिम पत्र

आदरणीया बहिन जी!

सादर नमस्कार । मैं आपसे भली-भांति परिचित हूँ। मेरी धारणा है कि मैंने आपको कलकत्ते में आज से दस वर्ष पहले। देखा था। उस समय आप बहुत छोटी थीं। यहाँ की दशा निस्सन्देह बहुत बुरी है । हम लोग शान्ति के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। आपकी यह इच्छा कि आप प्राणों पर खेल कर भी शान्ति के लिये प्रयत्न करें, बहुत स्तुत्य है। किन्तु मैं अभी आपको आगे आने के लिए नहीं कह सकता । मुसलमान नेताओं में से एक भी आगे नहीं बढ़ता।

पुलिस का ढंग बहुत निन्दनीय है। अधिकारी चाहते हैं कि लोग अच्छी तरह से निपट लें । पुलिस खड़ी खड़ी देखा करती है। मस्जिद और मन्दिर में आग लगाई जाती है। लोग पीटे जाते हैं,
और दूकानें लूटी जाती हैं । यह दंगा तो कल ही समाप्त हो जाता, यदि अधिकारी तनिक भी साथ देते। मैंने अपनी आँखों से अधिकारियों की इस उपेक्षा को देखा है। ऐसी अवस्था में मैं आपको कैसे कहूँ कि आप आगे आइए । अधिकारियों को तो यह ईश्वरदत्त अवसर प्राप्त हुआ है। वे इस पर सन्तुष्ट हैं । ईश्वर उनके इस सन्तोष को भंग करें, इस बात को सभी भले आदमी चाहेंगे।

विनीत,

गणेशशंकर विद्यार्थी
'प्रताप' कार्यालय कानपुर 
25-3-1931

[यह पत्र विद्यार्थी जी ने अपने निधन से 7-8 घंटे पहले श्रीमती इंदुमती गोयनका के नाम लिखा था। यह उनका अंतिम पत्र था।] 

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