विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग

कागज़

कागज़ | Hindi poem by Swaraangi Sane

उन पीले ज़र्द कागज़ों के पास
कहने को बहुत कुछ था।
उन कोरे नए कागज़ों के पास
भीनी महक के अलावा कुछ न था।

पीले पड़ चुके कागज़ों की
स्याही भी धुँधला गई थी
कोनों से होने लगे थे रेशा-रेशा
पर कितने अनकहे अनुभवों-अनुभूतियों को लिये थे वे।

हालाँकि
नये कागज़ चिकने भी थे
और उन पर लिखा जाना था बहुत कुछ।
शायद और भी बेहतर
फिर भी भिगो गये थे आँखों को
बड़े अपने से लग रहे थे पुराने हो गए पन्ने
जो फड़फड़ा रहे थे मन में।

-स्वरांगी साने

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