यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

जय जय भारत देश | कविता

जय जय भारत देश | Hindi Poem by Dr Divik Ramesh

वे 
जिनके पास कोई घर नहीं
अकसर उन्हीं के पाcस 
दिखते हैं घर घोंसलों से।

वे
जो अकसर सो जाते हैं भूखे
दिखने में सबसे तृप्त होते हैं।

वे
कोई भाग्य नहीं जिनका
अकसर  सबसे ज्यादा 
पूजते हैं भाग्य को।

वे
जिनके पास कुछ नहीं होता
अकसर उन्हीं को देखा है तत्पर
लुटाने को सबकुछ।

वे
जो खुद गुजर करते हैं भीख मांग कर
ईश्वर से मांगते हैं समृद्धि
दाताओं की।

वे
जो अकसर जरूरी हैं हर काम में
वही नहीं पूछे जाते कहीं भी।

वे
जिनमें बसी हैं आँधियां, शोर और चट्टानें
सबसे ज्यादा शांत, चुप और कमजोर
नजर आते हैं अकसर ।

-दिविक रमेश

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