भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

हफ्तों उनसे... | हज़ल

हफ्तों उनसे... | अल्हड़ बीकानेरी की हज़ल

हफ्तों उनसे मिले हो गए 
विरह में पिलपिले हो गए 

सदके जूड़ों की ऊँचाइयाँ 
सर कई मंजिले हो गए 

डाकिये से 'लव' उनका हुआ 
खत हमारे 'डिले' हो गए 

परसों शादी हुई, कल तलाक 
क्या अजब सिलसिले हो गए 

उनके वादों के ऊँचे महल 
क्या हवाई किले हो गए 

नौकरी रेडियो की मिली 
गीत उनके 'रिले' हो गये

हाशिये पर छपी जब ग़ज़ल 
दूर शिकवे-गीले हो गए

-अल्हड़ बीकानेरी 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।