राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

गुरुदक्षिणा

गुरुदक्षिणा | Hindi poem by Jainan Prasad

सायक बिकते हैं
धनुः विद्या भी बिकती है
पर बिकते नहीं हैं तो केवल
द्रोणचार्य जैसे गुरु।
लेकिन
सौभाग्य से अगर
मिल भी गए
और कृपालु हों वे
अर्जुन ही समझ लें तुम्हें
तो किंकर्तव्यविमूढ़ की भांति
तुम लक्ष्य अनुसंधान कर पाओगे?
भेद पाओगे! क्या?
वह आँख?
अगर इस दुष्कर कार्य में
सफलता मिल भी गई
तो मांग बैठेगा तुमसे !
गुरुदक्षिणा !
जो तुम दे नहीं पाओगे
क्योंकि तुम
एकलव्य नहीं हो।

-जैनन प्रसाद
 ई-मेल: jprasad@unicef.org

 

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