अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

गूँगी | कहानी

गूँगी | Heart-Touching Hindi Story by Padumlal Punnalal Bakshi

Gungi Hindi Story by Padumlal Punnalal Bakshi

गूँगी का नाम था गोमती। पर वह खूब बोलती थी। इसलिए मैंने उसका नाम गूँगी रख दिया था। गूँगी बन जाने पर भी गोमती की वाक्-शक्ति कम नहीं हुई। तो भी सब लोग उसे गूँगी ही कहते गये।

गूँगी हम लोगों की दासी विमला की लड़की थी। ऐसे वंश में जन्म देकर भी भगवान् ने उसे कुछ ऐसा रूप दिया था कि उसे देखते ही सब लोग उसे गोद में ले लेना चाहते थे। वह प्रति दिन अपनी माँ के साथ हमारे घर आती। जब तक विमला घर का काम-काज करती, वह मिनी के साथ खेलती। जब मिनी पढ़ने के लिए आती, तब वह भी आ जाती। पर वह चुप तो बैठ नहीं सकती थी, इसलिए वह भी मिनी के साथ पढ़ती थी। गूँगी की बुद्धि भी तीव्र थी। मैंने देखा थोड़े ही दिनों में वह मिनी से आगे बढ़ गई। उसकी ऐसी बुद्धि देख, मैं उसे खूब उत्साह से पढ़ाने लगा। मैं पाँच वर्ष तक बिलासपुर में रहा, और गूँगी पाँच वर्ष तक मुझसे पढ़‌ती रही। जब मुझे बिलासपुर छोड़कर कलकत्ता जाना पड़ा, तब गूँगी 11 वर्ष की थी। पर उस समय भी उसने मुझसे 'बालिका भूषण', 'भूगोल', 'अंक-गणित' और 'इतिहास' तक के कुछ अंश पढ़ लिए थे। जाते समय मैं उसे 'रामचरितमानस' देता गया। मैं जानता था, थोड़े ही दिनों में वह सब भूल जाएगी।

कलकत्ता आते ही मेरा भाग्योदय हुआ। साहब की मुझ पर कृपा दृष्टि हुई। मेरी पदोन्नति होने लगी। मैं भी खूब परिश्रम करने लगा। कलकत्ता में मैं 15 वर्ष तक रहा। 15 वर्ष के बाद मैं फर्स्ट ग्रेड का डिपुटी मजिस्ट्रेट होकर श्रीरामपुर चला गया।

शीत-काल का प्रारम्भ ही था, पर ठण्ड पड़ने लगी थी। मैं बाहर धूप में कुर्सी डालकर आराम से 'स्टेट्‌समैन' पढ़ रहा था। कुछ देर पढ़ने के बाद मैंने 'स्टेट्समैन' फेंक दिया और एक बार चारों ओर दृष्टि-पात किया। मेरे घर के सामने ही एक कुआं था। प्रतिदिन वहाँ प्रातःकाल स्त्रियों की बड़ी भीड़ रहती थी। उस दिन भी वहाँ स्त्रियों की संख्या कम न थी। मैंने देखा कि हमारे घर की दासी, मालती, भी गगरा लिए बैठी है। इतने में कुछ स्त्रियाँ लकड़ियों का गट्ठा सिर पर लिए उधर से निकलीं। मालती ने उनमें से एक को पुकारकर कहा-"लकड़ी बेचोगी?" उत्तने उत्तर दिया, "क्या दोगी?"

मालती कहने लगी-"तू ही कह दे ना, क्या लेगी?"

उस स्त्री ने कहा-"आठ आना।"

मालती ने कहा, "बस बहन, हो गया यह तो लेने-देने की बात नहीं है।"

तब उस स्त्री ने कहा- "बहन, छः आने से कम न दूँगी, तुम्हें लेना हो तो लो, नहीं जाती हूँ।"

यह कहकर बह जाने का उपक्रम भी करने लगो।

मालती ने कहा- "मैं तो पाँच आने दूंगी। तब यह स्त्री जाने लगी।

इतने में दूसरी लकड़ीवाली ने उससे कहा- "दे दे री, पाँच आने ठीक तो हैं।"

उस स्त्री ने उत्तर दिया "नहीं बहन, मैं न दूँगी; छः आने से एक कौड़ी भी कम न देगी।"

तब तक मालती ने गगरा भर लिया था। वह कहने लगी- "अच्छा ला।"

वह स्त्री मालती के साथ आने लगी। उसकी संगिनी लकड़ीवाली दूसरी ओर चली गई।

मैंने फिर चश्मा साफ करके 'स्टेट्समैन' उठा लिया और पढ़ने लगा। थोड़ा ही पढ़ा था कि मालती आकर कहने लगी- "बाबूजी, लकड़ीवाली लकड़ी रखकर कहाँ गई? उसने पैसे भी नहीं लिए!"

मैंने कहा- "आती होगी; उसे क्या अपने पैसों की चिन्ता न होगी?" मालती चुप हो गई। तब तक धूप कुछ तेज़ हो गई थी। मैंने उससे कहा- "मालती, कुरसी भीतर रख दे।"

मालती ने वैसा ही किया। मैं भीतर बैठ गया।

दस बजते ही मैं कचहरी चला गया। दिन-भर मैं काम में लगा रहा। संध्या होते ही मैं घर पर लौट आया। घर में आकर मैंने देखा कि पुरुषोत्तम बाबू मेरे कमरे में बैठे हुए हैं। मैंने प्रसन्नता-सूचक स्वर में कहा- "ओ हो, पुरुषोत्तम बाबू! इतने दिनों में मिनी कैसी है?"

पुरुषोत्तम बाबू ने कहा- "वह भी तो आई है।"

तब तो मैं पुरुषोत्तम बाबू को छोड़कर भीतर चला। देखा, तो मिनी कमला के साथ बैठी हुई है।

मिनी ने मुझे प्रणाम किया। मैंने उसे अन्तःकरण से आशीर्वाद दिया। बड़ी देर तक हम लोग बैठे रहे। इधर-उधर की खूब गप्पें होती रहीं। ग्यारह बजे हम लोग सोने गये।
दूसरे दिन मैं फिर बाहर कुरसी डालकर बैठ गया। पुरुषोत्तम बाबू अभी तक सो रहे थे। मैंने स्टेट्समैन उठा लिया। थोड़ी देर बाद मैं फिर कुँए की ओर देखने लगा। आज भी वहाँ स्त्रियों की वैसी ही भीड़ थी। मालती भी गगरा लिए वहाँ बैठी थी। इतने में पिछले दिन की लकड़ीवाली फिर उधर से निकल पड़ी। मालती ने उसे पुकारकर कहा-"ओ लकड़ीवाली! कल तूने पैसे नहीं लिए?"

यह कहने लगी- "बहिन, आज भी तो लकड़ी लाई हूँ। इन्हें भी ले लो! दोनों का दाम साथ ही ले लूँगी।"

मालती ने कहा- "अच्छा।" इतने में पुरुषोत्तम बाबू आ गए। मैं उनसे गप्पें मारने लगा। थोड़ी देर में भीतर से "चोर! चोर!!" का हल्ला हुआ। हम लोग घबराकर भीतर दौड़े। देखा, लकड़ीवाली को दरबान ने पकड़ लिया। मालती-आदि चार-पाँच और स्त्रियाँ इधर-उधर खड़ी थीं। मुझे देखकर सब चुप हो गई। मैंने पूछा- "माजरा क्या है?"
मालती कहने लगी- "बाबू, मैं इस लकड़ीवाली के पैसे लाने के लिए भीतर गई। लौटने पर देखती हूँ कि यह नहीं है। इतने में आपके कमरे में से कुछ आवाज आई। मैं 'चोर-चोर' कहकर चिल्लाने लगी। जब दरबान आया, तब यह आप के कमरे में पकड़ी गई।"

दरबान ने कहा- "बाबू, इसने अपने कपड़ों में कुछ छिपा लिया है।"

तब मैंने लकड़ीवाली से पूछा- "क्यों, क्या बात है?"

लकड़ीवाली ने एक बस्ता निकालकर कहा- "बाबूजी, मैं इसे रखने के लिए आई थी।"

मैंने बस्ता खोलकर देखा, तो उसमें 'रामचरितमानस' की एक कॉपी थी। उसके ऊपरी पृष्ठ पर मेरे हाथ का लिखा हुआ था-'गूँगी'। मैं चौंक पड़ा। तब मैंने लकड़ीवाली की ओर ध्यान से देखा। यह मेरी 'गूँगी' ही थी। "गूँगी!" मैंने इतना कहा ही था कि वह मेरे पैरों पर गिर पड़ी। क्षण-भर के लिए सब भूलकर मैंने उसे गोद में उठा लिया। गूँगी मेरी गोद में रोने लगी।

-पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

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