
दो बूढ़े व्यक्ति एक स्थान पर मिले। शीघ्र ही एक दूसरे का परिचय लिया-दिया। परिवार की बात चली तो पहले ने भाव विह्वल होते हुए कहा, “भाई साहब, एक ही बेटा है मेरा। पैसा कमाने के लिए जर्मनी गया हुआ है। वह इतना व्यस्त है कि उसे यहाँ आने की फुरसत ही नहीं मिलती। कहता है, जल्दी लौटने से वहाँं की नागरिकता पाने में कठिनाई आयेगी। चार महीने पहले उसकी माँ गुजरी तब भी वह नहीं आ पाया। मैं तो तरस गया हूँ भाई, बेटे की शक्ल देखने के लिए।”
कहते-कहते बूढ़ा व्यक्ति रो पड़ा था।
“दुखी मत होवो, भाई। स्थिति लगभग मेरे साथ भी ऐसी ही है। बेटा मेरा भी एक ही है। उसे भी मुझे से मिलने की फुरसत ही नहीं मिलती।” दूसरे बूढ़े ने पहले को ढाढ़स बंधाते हुए कहा था।
“किस देश में गया है तुम्हारा बेटा?” अपनी आँखें पोंछते हुए उसने दूसरे बूढ़े से पूछा था।
“वह यहीं रहता है मेरे पास। फर्क इतना है कि वह ऊपर की मंजिल में रहता है और मैं नीचे। ऊपर से उतरकर सीधे दफ्तर चला जाता है और लौटकर सीधे ऊपर। साल से ऊपर हो गया है मुझे उसकी शक्ल देखे हुए।”
इस बार फूट-फूटकर रोने की बारी उस बूढे़ की थी।
-रामकुमार आत्रेय
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