"बिमल, सोचता हूँ मैं वापस चला जाऊं'', प्रोफेसर महेश कुमार ने निराशा भरे स्वर में कहा।
मुझे उसके इस सुझाव का कारण पता था। फिर भी जान-बूझकर मैंने प्रश्न किया—"क्यों?"
''कल सूवा में गड़बड़ी हुई है। नैन्दी से कुछ आतंकवादियों ने एयर न्यूज़ीलैंड के विमान को हाइजैक करने की कोशिश की है। अगले सप्ताह तक पता नहीं यहाँ क्या कुछ न हो जाए।''
"हालात सुधर भी तो सकते हैं, प्रोफेसर साहब।''
''मैं जानता हूँ कि आप मुझसे जाने के लिये नहीं कहेंगे, क्योंकि मैं आप का मेहमान हूँ। कोई भी शिष्ट व्यक्ति अपने मेहमान से ऐसा नहीं कहेगा, पर मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि आपको मेरी चिन्ता है। मैं परदेसी हूँ। इस तरह की राजनीतिक उथल-पुथल के समय वर्तमान सरकार मुझे पकड़ भी सकती है।''
''वह कैसे? आप ने कौन-सा अपराध किया है?''
''भारत सरकार का खुफिया एजेंट समझ कर। तब तुम्हें भी परेशानी हो सकती है।''
मैं प्रोफेसर महेश की बात सुनकर ज़ोर से हँसा तो वह बोला—''आप तो मेरी बात को हँसी में उड़ा रहे हैं। पर मैं सब कुछ गंभीरतापूर्वक कह रहा हूँ।''
''ठीक है। मैं आप को नहीं रोकूँगा? मैं आपके मन की दशा समझता हूँ। घर में पत्नी और बच्चे चिन्ता करते होंगे।" मैंने कहा।
"यहाँ जो कुछ हो रहा है उसकी ख़बर तो हर जगह पहुँच गई होगी। भारत में भी। दिल्ली में हमारे घर भी। मेरे मित्र भी चिंता में डूबे होंगे। दूसरे, मैं यहाँ जिस काम के लिये आया हूँ, वह भी तो नहीं हो सकेगा। ऐसे माहौल में कहीं भी जाकर लोगों से मिल पाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।" प्रोफेसर महेश ने बड़ी अधीरता से कहा।
मैं कुछ चुप रहा। उसके चेहरे पर उदासी की फैलती रेखाओं को देखा। फिर मैंने धीरे से कहा—"आप की इस बात से तो मैं सहमत हूँ लेकिन यह एजेंट-वेजेंट वाली बात बिल्कुल बेकार है।"
मेरी बात सुनकर उसके होठों पर संतोष-भरी एक हल्की-सी मुस्कान फैल गई । अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा—''हम अपने ही घर में क़ैदियों की तरह बंद रहेंगे। जिन लोगों से हमें मिलना है, वे तो फीजी के लगभग हर शहर में हैं। इन परिस्थितियों में क्या हम कहीं जा सकते हैं?''
प्रोफेसर महेश का विचार ठीक था। हम कितनी देर तक बातों में उलझे रहे, पता ही नहीं चला। बातों-बातों में दिन ढल गया।
वह बहुत उदास शाम थी। बोझल और थकी सी। बाहर सड़कों पर सनसनाहट और वीरानगी। घर के भीतर हम लोग रेड़ियो से कान लगा कर समाचार सुन रहे थे। परिवार का कोई भी सदस्य कुर्सी या सोफे पर नहीं बैठा था। सब नीचे आसन जमाये हुए थे क्योंकि हमने रेड़ियो को उसके ऊंचे स्थान से उतार कर फर्श पर रखा हुआ था। कोई भी रेडियो और अपने बीच किसी दूरी को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं था। कोई पालथी मार कर बैठा था, कोई लेट रहा था। मैं और प्रोफेसर महेश दीवार के साथ पीठ टिका कर और पाँव पसार कर बैठे हुए थे। वातावरण में फैल रही अफवाहें मनों में दहशत पैदा कर रही थीं। तरह-तरह की शंकायें जन्म ले रही थीं। कल क्या होगा? इस प्रश्न का उत्तर हमारी कल्पना से बाहर था।
प्रोफेसर महेश दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले पन्द्रह वर्षो से अध्यापन और शोध कार्य में जुटा हुआ है। वैसे रहनेवाला वह उत्तर प्रदेश के बनारस जिले का है लेकिन दिल्ली में रहते-रहते वहीं का हो गया है। एक आकर्षण जो उसे अपने इलाके से बाँधे रखता है वह उसका गाँव रामपुर है। बनारस से तीस मील पूर्व की ओर। साफ सुथरी छोटी सी बस्ती। हरियाली से घिरी हुई। छोटे-छोटे कच्चे मकान। परिश्रमी और हँसमुख लोग। जब शहर के शोर-शराबे से प्रोफेसर का जी उकता जाता है तो वह अपने गाँव के शांत तथा उल्लासपूर्ण वातावरण में चला जाता है।
वातावरण में चला जाता है। पिछली शताब्दी में उसके अपने जिला बनारस से भी काफी लोग गिरमिट प्रथा के अंतर्गत यहाँ फीजी आये थे।
महेश अपनी नई पुस्तक 'प्रवासी भारतीय' पर पिछले तीन वर्षों से काम कर रहा है। उसने लगभग उन सब देशों की यात्रा कर ली है जहाँ-जहाँ भारत के लोग पिछली शताब्दी में मेहनत-मज़दूरी करने के लिये ले जाये गये थे। वह फीजी में बसे उन परिवारों से भेंट करना चाहता था जिनकी जड़े उत्तर प्रदेश में हैं। उसकी विशेष रुचि उन लोगों में थी जिनके पूर्वज बनारस जिले से आये थे। यह शायद इसलिये भी था कि बनारस उसका अपना क्षेत्र है।
फीजी में दो महीने रहने का कार्यक्रम बना था और वह मेरे साथ ताबूआ में ठहरा हुआ था। उसे भारत से आये एक सप्ताह ही बीता था कि राजनीतिक-सामाजिक तनावों ने उस का भ्रमण कार्यक्रम चौपट कर दिया, बाईस मई, शुक्रवार को उसके वापस लौटने के सारे प्रबंध हो गये। विमान की उड़ान रात के तीन बजे थी। हमें नैन्दी हवाई अड्डे पर दो बजे पहुँचना था। बड़ा अनुचित समय।
(2)
तावूआ से नैन्दी तक का सफर। दिलों में भय, शंका, हिचकिचाहट। आनेवाली रात से हम डरने लगे थे जैसे उस सुनसान खाली सड़क का अंधेरा हमें डस लेगा।
नैन्दी का गेटवे होटल। गोरे पर्यटकों की चहल-पहल। मद्धिम रोशनी में घूमती-थिरकती मेमें। संग-मरमर की तरह उनके चमकते हाथ, बाहें, टाँगें और चेहरे। बाहर लॉन में हरी घास का गलीचा। वहाँ रखी छोटी-छोटी गोल मेजें। उन पर आग छोड़ती बीयर की बोतलें। काँच के खूबसूरत गिलास। खनखनाती खंजरी की तरह यात्रियों की हँसी। कहीं धीमी-धीमी खिलखिलाहट और कहीं ज़ोर के ठहाके। थोड़ी दूर पर सजे सँवरे हॉल में पॉप संगीत की धुनें।
कमरा नम्बर तीस में हमने अपना सामान रखा। दीवारों, खिड़कियों और अलमारियों पर सरसरी नज़र दौड़ाई। हाथ-मुँह धोकर बाहर लॉन में एक मेज़ के चारों ओर रखी बैंत की कुर्सियाँ लेकर हम लोग बैठ गए। एक काईबीती कर्मचारी ने हमें बैठते हुए देखा तो वह हमारे पास आया। पहले मुस्कराया फिर अंग्रेजी में हमने पूछा—"पीने के लिये कुछ लाऊँ, जनाब?"
'मेरे लिये जूस का गिलास। महेश ने झट से कहा। शायद उसे डर था कि मैं उसके लिये व्हिस्की न मंगवा लें। अपने लिये व्हिस्की के पैग का आदेश देते हुए मैंने कहा—"अब तो कल दिल्ली पहुंच ही जाओगे इस खुशी में थोड़ी पी लो।"
महेश मेरी बात सुन कर धीरे से हँसा और दार्शनिक अंदाज में बोला—"भाई उस फिसलन से डरता हूँ जो कभी-कभी जाम और होंठों के बीच घट जाती है।"
'छोड़ो ये कविता की बातें। न पीने का कोई न कोई बहाना हर वक्त बना लेते हो। इस बात पर हम दोनों एक साथ हँस पड़े जैसे किसी डाल पर बैठे दो पक्षी शाम के अंधेरे में चहचहा उठे हों।
पाँच-सात मिनटों में ही कर्मचारी एक सुन्दर ट्रे में दो गिलास सजा कर ले आया। गिलासों को मेज़ पर रख कर उसने बड़े अदब से पूछा—"किसी और चीज़ की आवश्यकता हो तो कहें।" मैंने 'नहीं' कह कर उसके चेहरे पर नज़र दौड़ाई। उसके होठों पर फैली मुस्कान को देख कर मैं उसका नाम पूछने से न रह सका।
"मेरा नाम लंगानी है।" उसने उत्तर दिया!
"यहाँ कब से काम करते हो?"
"सात सालों से।"
छोटा-सा जवाब देकर वह वहाँ से चला गया। थोड़ी देर के बाद वह फिर लौट आया। झिझकते हुए उसने हमसे कुछ कहा। किन्तु उसकी बात हमारी समझ में न आई। मैंने उसे बताया कि मैं टूरिस्ट नहीं हूँ। फीजी का ही हूँ। वह शर्माये नहीं। खुलकर बात करे। महेश के बारे में मैंने उसे संक्षेप में बताया। तब वह बोला, "वह जो हिन्दुस्तानी औरत।" उसने उंगली से अंधेरे कोने की ओर संकेत किया।
"हाँ, क्या हुआ उसे?" मैंने पूछा।
"वह अकेली है। यहाँ बुला लो उसे।"
"क्यों क्या बात है?"
"बात तो कोई नहीं। आप भारतीय हैं। वह आप की भाषा में आप लोगों से कुछ बतिया लेगी। अकेली बैठी है। कुछ समय के लिये उसका दिल बहल जाएगा।"
लंगानी उसे बुलाने गया तो महेश थोड़ा चिंतित होकर कहने लगा—"भाई, किसी झंझट में न फंस जाएँ। हवाई जहाज पकड़ना है। कोई बखेड़ा खड़ा कर देगी। दो चार बातें करके टरका देना।"
"क्यों, पसीना छूटने लगा? कुछ नहीं होगा। आप को पकड़ कर यहाँ बांध तो नहीं लेगी।" उसकी बात का उत्तर देते हुए मैंने कहा।
महेश कुछ कहने ही वाला था कि लंगानी उस महिला को लेकर आ गया। महेश ने उसे देखकर राहत की साँस ली। वह जवान नहीं थी मगर मैं अनुमान लगा रहा था कि युवावस्था में वह काफी खूबसुरत रही होगी। मैं तब उस इतिहासकार की तरह सोच रहा था जो किसी खूबसुरत महल के खंडहरों को देखकर उसकी वास्तविक सुन्दरता का अनुमान लगाने का प्रयास करता हो।
"राम, राम बेटा।" उसने बैठते ही महेश की ओर देख कर कहा। महेश ने "राम, राम" कह कर उत्तर दिया और लंगानी को जूस का एक गिलास लाने के लिए इशारा किया।
मैं उसके बूढ़े हो रहे अधेड़ चेहरे और काले बालों में कहीं-कहीं छुपे हुए सफ़ेद तारों को देखने लगा। तब तक महेश उससे कुछ औपचारिक बातचीत करने लगा था—गन्ना काटने-कटाने की, मिल के चलने या न चलने की, देश में अचानक सैन्य शासन स्थापित होने की और भारतीयों की घबराहट की।
हम से थोड़ी दूर बैठे गोरे मेहमानों की बातों के स्वर ऊंचे हो रहे थे, थोड़ा और पीछे होटल के हाल में पॉप संगीत के भी।
"कहाँ रहते हो बेटा?" उसने अपनी सफेद साड़ी का पल्ला सिर पर अच्छी तरह टिकाते हुए महेश से पूछा।
"मैं भारत से आया हूँ। आज लौट रहा हूँ। आप कहाँ रहती हैं?" महेश ने बड़ी विनम्रता के साथ उससे पूछा।
"वातूकोला में। मैंने आप के आने के बारे में यहाँ के हिन्दी समाचार पत्र में पढ़ा था।"
"यह वातूकोला वही इलाक़ा है जहाँ सोने की खानें हैं?"
"हाँ, उधर बहुत बड़ा कारखाना भी है।"
"आप का नाम?"
मेरा नाम मेरे दो नाम है। असली नाम सिरोजनी है। यह शादी के पहले का नाम है। ब्याह के बाद ससुराल आई तो मुझे मेरा आदमी राम दुलारी कहने लगा।"
"राम की भक्तिन हो क्या?"
महेश का यह सवाल सुन कर वह हँस पड़ी। फिर झट से बोली—"मेरे आदमी का नाम भी राम— राम नारायण था। उसने मुझे यह नाम देते हुए शायद यह भी सोचा होगा कि शादी के बाद मुझे देहात में रहना है। इसलिए देहाती नाम ही अधिक ठीक रहेगा।"
"भाषा तो देहाती नहीं है, आप की।"
"मैं फीजी हिन्दी भी बोल लेती हूँ। आप जैसे पढ़े-लिखों के साथ मानक हिन्दी भी।"
"शिक्षा कहाँ ली?"
"पहले स्कूल में पढ़ी। स्कूल छोड़ने के बाद एक साल रेडियो फीजी में हिन्दी विभाग में काम किया। बोलने का अभ्यास हो गया। शादी होने तक सूवा में अध्यापिका बनी रही। हिन्दी में मेरी विशेष रुचि थी।"
"तभी! हमें देखकर अपनी भाषा में बात करने के लिए आपका जी ललचा उठा।" महेश ने इतने शब्द कह कर जूस का एक घूँट पिया और मेरे कान में धीरे से फुसफुसाने लगा—"बड़ी दिलचस्प महिला से भेंट हो गई। मेरे शोध कार्य में एक विशेष कड़ी बन सकती है।"
"तू तो मिलने से भी डरता था। किस मोड़ पर किस वेश में कौन मिल जाये? कई दफा हमें पता ही नहीं चलता।" मैंने धीरे से उससे कहा। फिर राम दुलारी के जूस के गिलास की ओर देखा और कहा—"बातें करते जाइये और इसे भी पीते जाइये।"
"चिन्ता न करो। सब पी लूँगी। आप भी मुल्क के हैं?”
"नहीं, मैं आप के मुल्क का हूँ!"
मेरे इस अंदाज में बात करने पर वह मुस्करा पड़ी। मैंने अपना परिचय देते हुये कहा—
-जोगिन्द्र सिंह कंवल
[क्रमश:]
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