भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

एक बरस बीत गया | कविता

एक बरस बीत गया | अटल बिहारी वाजपेयी की कविता | Poem by Atal Bihari Vajpayee

एक बरस बीत गया
झुलसाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया

सींकचों में सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अंबर तक
गूँज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया

पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया

- अटल बिहारी वाजपेयी

 

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