1904 में भारत के अलीगढ़ के अंतर्गत दरियापुर ग्राम में जन्मे धनीराम पहले प्रवासी हिंदी कथाकार हैं। उन्होंने कहानी, काव्य, आलेख, यात्रा-वृतांत के अतिरिक्त हिन्दी फिल्मों के गाने व पटकथा लिखी। इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की पृष्ठभूमि में लिखी गई उनकी पहली कहानी ‘डोरा’ हिंदी की ‘भविष्य’ पत्रिका में अक्टूबर, 1930 के अंक में प्रकाशित हुई थी। ‘डोरा’ (1930) के अतिरिक्त भी उनकी अनेक कहानियाँ प्रकाशित हुई जिनमें नानी (1931), साहस (1932), अछूत (1932), गायक (1932) पहेली (1932), बदला (1932), आहुतियाँ (1933), देवता (1933) और लालारुख (1933) सम्मिलित हैं। बाद में लिखी गई कहानियाँ बारहसैनी मासिक में प्रकाशित हैं। पहली बार विलायत से उच्च शिक्षा पाकर भारत लौटने पर उन्होंने ‘चाँद’ और ‘भविष्य’ जैसी अपने समय की लोकप्रिय पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्हें कथा-सम्राट प्रेमचंद का सानिध्य और मार्गदर्शन भी मिला। डॉ धनीराम प्रेम ने अनेक हिंदी फिल्मों के गीत और पटकथाएँ लिखीं और बाद में जब स्थायी तौर पर विलायत जा बसे तो वहाँ पहले एशियाई पार्षद होने का गौरव पाया और मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय रहकर नाम कमाया। एक अबोध अनाथ बालक से अंतरराष्ट्रीय मंच तक, अनाथ धनीराम से डॉक्टर धनीराम ‘प्रेम’ होने का उनका सफर निःसंदेह सरल न था।
आज देश-विदेश में अनेक प्रवासी भारतीय लेखन से जुड़े हुए हैं और विदेशों में चिकित्सक और राजनीतिज्ञ के रूप में अपनी सेवाएँ भी दे रहे हैं लेकिन हम बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों की बात कर रहे हैं, जब देश गुलाम था और भारतीयों के लिए विदेशों में प्रतिकूल प्रस्थितियाँ थीं। डॉ धनीराम उस समय भारतीय समुदाय की आवाज बने जब आवाज उठाने का मतलब विपत्तियों के अतिरिक्त कुछ नहीं था। तरुण अवस्था में जिस बालक ने देश के लिए कारावास तक भोगा हो और बिना माँ-बाप के होते हुए भी अपना संघर्ष जारी रखा हो, उसे प्रतिकूल प्रस्थितियाँ भला कैसे विचलित कर सकती थीं! यह बालक आगे चलकर भारत और समूची मानवता के लिए अनेक कार्य करने वाला था। अचरज की बात है कि ऐसे व्यक्ति को जिसे उसके कामों के लिए ब्रिटिश और भारत ने खूब सराहा हो, जो प्रवासी होकर ब्रिटेन के भारतीयों की आवाज बन गया हो, उसका नाम विस्मृत हो चुका है। अधिक आश्चर्य तब होता है, जब प्रवासी साहित्य में भी डॉ धनीराम प्रेम का नाम नदारद मिलता है। हिंदी में प्रवासी कथा-साहित्य का आरम्भ प्रेमचंद की 'यही मेरी मातृभूमि है' (1908) और शूद्रा (1926) की कहानियों से मान्य है, लेकिन यदि हम किसी प्रवासी द्वारा लिखी गई ‘हिंदी कहानी’ की चर्चा करें तो 1930 में भविष्य पत्रिका के अक्टूबर अंक में प्रकाशित डॉक्टर धनीराम प्रेम की कहानी ‘डोरा’ पहली ऐसी कहानी थी, जो किसी भारतीय प्रवासी द्वारा विदेशी ज़मीन पर लिखी गई थी।
'डोरा' एक उच्च कोटि की प्रेम-कहानी है। केवल तीन पात्रों की इस कहानी का मौलिक भाव प्रेम है। आत्म-चरित्र पद्धति की इस कहानी का कथानक सरल, रोचक और उत्कृष्ट है। कहानी का नायक भारतीय नवयुवक ‘मोहन’ है, वह स्वास्थ्य लाभ हेतु विलायत (इंग्लैंड) जाता है। वहाँ दो मास लंदन में रहने के बाद वह स्कॉटलैंड के हाईलैंडर्स की एक रम्य घाटी में अपना निवास-स्थान बनाता है। कहानी की शुरुआत में ‘मोहन’ जब सैर करने के लिए जाता है तो अचानक उसे किसी लड्की के चीखने की आवाज सुनाई देती है। मोहन उसकी मदद के लिए जाता है, एक जंगली कुत्ते ने उस लड़की पर हमला बोल दिया था। वह उस लड़की की रक्षा करता है। इस प्रकार कहानी के नायक ‘मोहन’ की मुलाक़ात स्थानीय युवती 'डोरथी विल्सन' से होती है। 'डोरथी विल्सन' को प्यार से 'डोरा' भी कहते हैं। यहीं से कहानी आगे बढ़ती है और दोनों एक-दूसरे को चाहने लगते हैं लेकिन शायद किसी तीसरे को यह भाता नहीं। मोहन को जान से मारने का प्रयास होने लगता है। एक बार एक व्यक्ति छुरी से मोहन पर हमला करता है, ‘डोरा’ आगे बढ़कर उसकी प्राण-रक्षा करती है लेकिन अपनी जान गंवा देती है। जिस ‘डोरा’ की किसी समय ‘मोहन’ ने प्राण रक्षा की थी उसी डोरा’ ने प्रतिदान स्वरूप मोहन के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
इस प्रकार जो युवक अपने स्वास्थ्य-लाभ के लिए विदेश गया था, वह टूटा हृदय लेकर वापिस लौटता है। संक्षेप में यही कहानी का कथानक है। यह कहानी पहली प्रवासी कहानी है और इसके अतिरिक्त भी डॉ धनीराम ‘प्रेम’ की कुछ कहानियाँ विदेशी ज़मीन की हैं। ‘डोरा’ कहानी से पहले भी प्रवासी काव्य और आलेख प्रकाशित हुए पर कथा-साहित्य नहीं।
डॉक्टर धनीराम प्रेम की राजनीतिक भूमिका की कुछ जानकारी अँग्रेजी में उपलब्ध है लेकिन उनके हिंदी साहित्य की अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं। अँग्रेजी जानकारी के आधार पर उनका परिचय अवश्य मिलता है लेकिन उनके साहित्य को जो स्थान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला। इसपर और शोध की आवश्यकता है ताकि हिंदी जगत उनके साहित्य से परिचित हो सके।
धनीराम ने बचपन में ही अपने माँ-बाप खो दिए। अनाथ अबोध बालक को अपने माता-पिता का स्मरण तक नहीं था, अपने आत्मकथ्य में वे लिखते हैं, “मुझे अपने माता-पिता का कुछ ध्यान नहीं है। मेरी तीन वर्ष की आयु के पहले ही वे इस लोक को छोड़ चुके थे। माता का स्नेह क्या होता है, यह मैंने कभी नहीं जाना।”
बालावस्था से ही धनीराम को हिंदी साहित्य से लगाव हो गया। प्राथमिक पाठशाला में ही वे लिखने लगे थे और अपने माता-पिता की कमी को अपनी रचना में व्यक्त करने का प्रयास करने लगे, वे लिखते हैं “मुझे भली-भाँति याद है कि जब मैं हिंदी की लोअर प्राइमरी कक्षा में पढ़ता था, तब इसी भाव को व्यक्त करते हुए मैंने कुछ दोहे लिखे थे। वे दोहे डिप्टी इंस्पेक्टर महोदय ने बहुत पसंद किए और उनके लिए पाव भर जलेबी उन्होंने पुरस्कार-स्वरूप भेंट भी की।”
एक बार कवि प० नाथूराम शंकर शर्मा 'शंकर' (1859-1935) की दृष्टि धनीराम एक पद्य पर पड़ गई। उसको पढ़कर 'शंकर' जी ने लिखा—
“प्रियवर प्रेम की पद्य पढ़ी। परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। अभी अभ्यास की अधिक आवश्यकता है। आशा है आगे चलकर प्रेम एक उच्च कवि की पदवी प्राप्त करेंगे।” प० नाथूराम शंकर शर्मा 'शंकर' आधुनिक खड़ी बोली के प्रारंभिक कवियों में से एक थे और वे महाकवि शंकर के नाम से जाने जाते थे।
बचपन में अनाथ हुए बालक धनीराम को दुनिया भर की मुसीबतों का सामना करना पड़ा। हालांकि वे एक अच्छे परिवार से थे और उनकी पैतृक संपत्ति भी थी लेकिन सरकार की तरफ से जिस संबंधी को अभिभावक बनाया गया, उसका व्यवहार इनके प्रति अच्छा न था। धनीराम घर से भाग गए और एक पुस्तकालय में आश्रय लिया। मेहनत-मजदूरी करके साथ-साथ पढ़ने रहे। वे गांधी जी से प्रभावित थे और कांग्रेस की सभाओं में भी जाते थे। क्रांति के बारे में किताबें पढ़ने के बाद धनीराम की राजनीति में रुचि जगी। वह भारत में शांतिपूर्ण स्वतंत्रता लाने के लिए महात्मा गांधी के आंदोलन से भी प्रेरित हुए। वे अपने शहर के पास के गांवों में बैठकों व जलसों को संबोधित करने लगे। कांग्रेस के एक किशोर सदस्य के रूप में और एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हें दो बार कारावास की सजा भुगतानी पड़ी। पहली बार तो केवल 12 वर्ष की अवस्था में उन्हें एक दिन का कारावास हुआ। दूसरे कारावास की कहानी का परिचय आपको आगे मिल जाएगा।
असहयोग आंदोलन के समय तक धनीराम ने प्रेमचंद के सभी उपन्यास और कहानियां पढ़ चुके थे। वे अपने संस्मरण में लिखते हैं, “सन् 1920 में असहयोग (आंदोलन) के समय तक मैं उनके सारे उपन्यास और कहानियां पढ़ चुका था और उन्हें पढ़कर यह इच्छा बलवती हो गयी थी कि उनसे भेंट करके उन्हीं की तरह कुछ लिखें।”
बात 1921 की है, कथा-सम्राट प्रेमचंद कानपुर के मारवाड़ी विद्यालय के प्रधानाचार्य बने। जब धनीराम को इसकी सूचना मिली तो वहां जाने का निश्चय कर लिया। इस बीच प्रेमचंद से पत्र-व्यवहार करके अपनी कहानियाँ के बारे में मार्गदर्शन का अनुरोध भी किया।
धनीराम को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ जब उन्होंने प्रेमचंद के हाथ का लिखा हुआ पत्र पाया। उस पत्र में प्रेमचंद ने लिखा था—"प्रियवर, आपने जो कुछ कहानियाँ लिखी हैं, मुझे भेज दो, मैं देखकर सम्मति लिख दूँगा। जो छप चुकी हैं, वे भी देखने को भेज दीजिएगा। यदि आप कानपुर आना चाहते हैं तब तो यहाँ बातें हुआ ही करेंगी।'
प्रेमचंद के हृदय की इस विशालता पर किशोर धनीराम मुग्ध हो गए। अब तो हिम्मत बढ़ गई और धनीराम ने अगले पत्र के साथ अपनी लिखी हुई एक छोटी-सी कहानी भी भेजी।
चार दिन बाद ही उत्तर आ गया और संशोधन के साथ कहानी भी। उत्तर में लिखा था, “प्रियवर, तुम्हारे पत्र का उत्तर देने में दो दिन की देरी हो गई। वह इसलिए कि गांधीजी मेरे स्कूल में आये थे। तुम कहानियां अच्छी लिख सकते हो। मेरी सलाह है कि कुछ अच्छी अंगरेजी की कहानियां और उपन्यास समय मिलने पर पढ़ते रहा करो।”
धनीराम इस घटना को याद करते हुए लिखते हैं, “मुझे अच्छी तरह याद है कि किस प्रकार मैं उस पत्र को अपने मित्रों को दिखाकर प्रेमचंदजी के विशाल हृदय की सराहना करता फिरता था। उस पत्र ने उनके प्रति मेरी श्रद्धा और भी बढ़ा दी और वह शीघ्र ही मुझे कानपुर खींच ले गई।”
मारवाड़ी विद्यालय के दफ़्तर में प्रेमचंद का प्रथम दर्शन हुआ। उक्त विद्यालय में मैट्रिक न होने के कारण धनीराम को एक दूसरे विद्यालय में जाना पड़ा; परंतु प्रेमचंद के कहे अनुसार वे समय-समय पर उनके दर्शन करते रहे। यह क्रम भी अधिक दिनों तक न रहा। प्रेमचंद कानपुर से बनारस चले गए और धनीराम कारावास में। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कारावास का दंड जो दिया था। उन्हीं के शब्दों में, “कानपुर में, मेरे दुर्भाग्य से, उनका साथ मुझे अधिक दिनों तक न मिल सका, क्योंकि थोड़े दिन बाद ही वे कानपुर छोड़कर बनारस चले गये और मैं जेल चला गया।”
एक बार पहले एक दिन का कारावास काट चुके ‘धनीराम’ को दूसरी बार गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने और 80,000 लोगों की एक सभा को आधे घंटे तक संबोधित करने के बाद पुनः राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इसबार युवा धनीराम पर न्यायालय की अवमानना करने एवं राजद्रोह का अभियोग लगाया गया। इस मामले में उन्हें एक वर्ष का कारावास हुआ।
कारवास में धनीराम को क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का भी सानिध्य मिला। कारावास की सजा भुगतने के बाद ‘धनीराम’ दुबारा अध्ययन में लग गए। विद्यालय की शिक्षा पूरी करने के पश्चात एक धर्मार्थ संस्था के सहयोग से धनीराम बंबई में चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा लेने लगे। भारत में चिकित्सा की शिक्षा पूरी करने के बाद 1928 में कुछ वर्ष के लिए विलायत में उच्च शिक्षा लेने के लिए गए और 1931 में भारत लौटे। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा। इसी समय ‘डोरा’ कहानी भी लिखी, जो अक्टूबर, 1930 में 'भविष्य' पत्रिका में प्रकाशित हुई। 1929 से 1931 के बीच, अपने प्रवास में उन्होंने अनेक यात्रा-वृतांत भी लिखे हैं, जिनमें कोलंबो से लंदन, माधुरी (मार्च 1929), लंदन का प्रथम दर्शन (चाँद,1929), स्कॉटलैंड का सैर (सुधा,1930), मेरा यूरोप भ्रमण, (चाँद,1932) सम्मिलित हैं।
विलायत से उच्च शिक्षा पाने के बाद जब डॉ धनीराम ‘प्रेम’ 1931 में भारत लौटे तो उस समय वे चिकित्सा क्षेत्र में नौकरी पाने में असफल रहे। इस समय तक वे कहानियाँ लिखना शुरू कर चुके थे और हिन्दी साहित्य जगत में अपनी एक पहचान भी बना चुके थे। इसी समय में उन्होंने कुछ समय 'चाँद' पत्रिका का संपादन किया। चाँद पत्रिका का संपादक होने पर एक बार उन्होंने प्रेमचंद को ‘चाँद’ के लिए कहानी भेजने का अनुरोध किया तो प्रेमचंद का उत्तर आया, “अरे, मैं नहीं जानता था कि अपना धनीराम ही 'डॉ धनीराम प्रेम, लन्दन' है। तुम्हारी कहनियां पढ़कर कुछ खिंचाव होता था, लेकिन यह नहीं समझा था कि इसका कारण यह है।”
इसके बाद दोनों के बीच पत्र-व्यवहार होता रहा। ‘चाँद’ में कुछ समय' रहने के बाद जब डॉ धनीराम प्रेम एक गीतकार और पटकथा लेखक के रूप में बम्बई चले गए तो एक बार उन्होंने प्रेमचंद को साहित्य से अलग होने की अपनी इच्छा से परिचित करवाया। इसके उत्तर में प्रेमचंद का पत्र आया, “अरे भाई, कहीं यह हो सकता है कि इतने खेल खेल कर तुम साहित्य से आसानी से नाता तोड़ दो। मैं इस बात का अनुरोध करता हूँ कि तुम कम से कम दो घंटे रोज साहित्य के लिए अवश्य दो।”
प्रेमचंद के पत्र ने ही डॉक्टर धनीराम प्रेम को हिंदी साहित्य से जुड़े रहने को प्रेरित किया। वे स्वयं लिखते हैं, “यह उन्हीं (प्रेमचंद) का अनुरोध था कि मैं अन्य कार्यों में फंसे रहने पर भी हिंदी में कुछ न कुछ लिखता रहा हूं। नहीं तो शायद अब तक मेरा सम्बन्ध हिन्दी साहित्य से कभी का टूट गया होता। जहां तक मेरा खयाल है, इसी प्रकार प्रेमचंदजी ने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में दर्जनों नवयुवकों का प्रवेश कराया और उन्हें वहां जमाया। यह भी हिंदी के लिए उनकी एक बड़ी भारी सेवा थी।”
एक बार एक पुस्तक के प्रकाशन में विलंब को लेकर डॉ धनीराम और प्रेमचंद में कहा-सुनी भी हुई, वे लिखते हैं, “उनके प्रेस में छपने के लिए मैंने एक पुस्तक भेजी थी। दो महीने का वायदा था और छः महीने में भी वह पूरा न हुआ। काफी पत्र-व्यवहार हुआ और कटु शब्दों का परिवर्तन। अन्त में मैंने वह अधूरी पुस्तक वापस मंगा ली।”
जब सारा झगड़ा समाप्त हो गया, तो प्रेमचंद ने धनीराम को एक पत्र में लिखा, 'इस देरी में मेरा कोई अपराध नहीं था। बात यह है कि प्रबन्ध में मैं बहुत ही कच्चा हूं और दुर्भाग्य से इस कारण मेरे अपनो को ही दुःख अधिक पहुंचा है, प्रेस में से लोग रुपया खा गये हैं। तुम यहाँ आकर अगर देख सको तो मेरी मुश्किलों को समझोगे। शायद हम लोगों की किस्मत में कटु शब्द बदलना लिखा था। खैर, अब हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध और भी सुदृढ़ होगा। जब हम मिलेंगे, तो यह धब्बा मिट जाएगा।'
धनीराम प्रेम ने विभिन्न पुस्तके लिखी जिनमें भारत का कहानी साहित्य, ’वल्लरी (कहानी संग्रह), प्राणेश्वरी, प्रेम गीतांजलि, मृतात्माओं से बातचीत, वीरंगना पन्ना, मेरा देश (राजनैतिक उपन्यास), वेश्या का हृदय (उपन्यास), नरभक्षी बकासुर, चांदनी (नई कहानियों का संग्रह), देवी जोन, रूस का जागरण इत्यादि सम्मिलित हैं। उन्होंने चिकित्सा से संबन्धित ‘हमारा भोजन’ और ‘सन्तति निग्रह’ नामक पुस्तकें भी लिखी लेकिन अब वे फिल्मी दुनिया में स्थापित होने चले थे। यह आर्थिक मंदी का समय था। 1929 से 1939 तक वैश्विक आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था, जिसने दुनिया भर के अधिकतर देशों को प्रभावित किया। भारत भी इसी दौर से प्रभावित था।
डॉ धनीराम ‘प्रेम’ ने फिल्मों के लिए लिखने का मन बना लिया था। उन्होंने 1932 से 1936 तक अनेक फिल्मों के लिए कहानियां, संवाद और गीत लिखे और फिर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पुनः 1946 में एक फिल्म के लिए लिखा। पहले 2 वर्षों में उन्होंने केवल रंजीत स्टूडियो की फिल्मों के लिए ही लिखा। बाद में वे स्वतंत्र लेखन करने लगे और दूसरों के लिए भी लिखते लगे, जिन फिल्मों में उन्होंने गीतकार या पटकथा लेखक या संगीतकार के रूप में लिखा उनमें दो बदमाश (1932), भूतिया महल (1932), भूल भुलैयाँ (1933), भोला शिकार (1933), परदेसी प्रीतम (1933), काला पहाड़ (1933), गरीब का प्यारा (1934), इन्दिरा एम.ए. (1934), मेरा ईमान (1934), अल्लादीन -II (1935), प्रीत की रीत (1935), मदन मन्जरी (1935), रंग भूमि (1935) गोल निशान (1936) एवं स्वदेश सेवा (1946) सम्मिलित हैं। हिन्दी फिल्म ‘दो बदमाश’ उनकी ‘प्राणेश्वरी’ कहानी पर आधारित है और परदेसी प्रीतम की कहानी भी डॉ धनीराम ‘प्रेम’ ने ही लिखी है।
यह भी दिलचस्प तथ्य है कि 30 के दशक में हिंदी फिल्मों में एक ही नाम के दो गीतकार थे—एक डॉ धनीराम प्रेम और दूसरे धनीराम। कुछ फिल्मों में तो दोनों ने एकसाथ गीत दिए हैं जैसे मदन मंजरी (1935) और प्रीत की रीत (1935)। डॉ धनीराम प्रेम ने 1932 से 1936 तक ही हिंदी फिल्मों के लिए काम किया। इसके पश्चात स्थायी रूप से इंग्लैंड बस जाने व कई वर्ष तक द्वितीय विश्व युद्ध के चलते वे फिल्मों के लिए नहीं लिख पाए। 1945 में विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1946 में उन्होंने ‘स्वदेश सेवा’ फिल्म के लिए गीत लिखे। दूसरी ओर, अन्य धनीराम हिंदी फिल्मों के लिए अपनी गीत-संगीत सेवाएँ काफी बाद तक देते रहे हैं।
फिल्मों में गीतकार और संगीतकार बनने से पहले धनीराम प्रेम गीत-संगीत पर अच्छी पकड़ रखते थे। देश मल्हार राग में उनकी एक रचना देखें—
“काहे बदरवा, मोहिं तरसाओ!
पिय के बिरह की अगिनि बढ़ी है--
मिलन-नीर सीतल बरसाओ।
मेरी पीर समुझि निरमोही,
आँसुन की दो बूँद बहाओ।
काहे बदरवा, मोहिं तरसाओ।”
इसी प्रकार डॉ० धनीराम प्रेम की अन्य रचना ‘राग खम्माच’ में देखें--
“माखन खाइ गयौ तेरौ कन्हैयाँ !
माखन कौ तौ माखन खायौ
मोरी मरोरि गयौ दोउ बैयाँ।
अपने कुमर को बरजौ जसोदा,
ग्वालिनि ठाड़ी परै तोरे पैयाँ।”
उपर्युक्त रचनाएँ चाँद के ‘संगीत सौरभ’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित हैं।
डॉ धनीराम ‘प्रेम’ 1938 में पुनः सपरिवार विलायत आए। हालांकि इस बार उनका यहाँ केवल एक वर्ष रुकने का इरादा था लेकिन 1939 से 1945 के बीच द्वितीय विश्वयुद्ध के चलते भारत वापसी संभव नहीं थी और वे सपरिवार स्थायी रूप से इंग्लैंड में बस गए, जहां उन्होंने चिकित्सक के रूप में अपना जीवन आरंभ किया। बाद में वे वहाँ बर्मिंघम सिटी कौंसिल के पहले एशियाई मूल के पार्षद भी बने। वे वहाँ की मुख्यधारा की राजनीति में भी सक्रिय हो गए। आपने लंबे समय तक भारतीय मूल के लोगों सहित समूचे एशियाई समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने एक राजनेता और नेता के रूप में पहचान अर्जित की। 29 नवंबर 1973 को उनकी पत्नी ‘रत्न प्रेम’ का कैंसर से निधन हो गया।
वर्ष 1977 में भारत सरकार ने डॉ धनीराम ‘प्रेम’ को पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके पश्चात 1978 में डॉक्टर धनीराम ‘प्रेम’ भारत गए और वहीं 75 वर्ष की आयु में 11 नवंबर 1979 को एक सड़क दुर्घटना में इनका निधन हो गया।
डॉ धनीराम 'प्रेम' भारतीय प्रवासियों के लिए एक आदर्श हैं। वे ब्रिटेन के पहले हिंदी कहानीकार ही नहीं बल्कि हिंदी के पहले प्रवासी कथाकार के रूप में जाने जाएंगे।
- रोहित कुमार हैप्पी
न्यूज़ीलैंड
संदर्भ
Prem, D. R., (1945). The Indian National Congress. Birmingham, England: Indian Publications.
Prem, D. R., & Heffer, E. S. (Eric S. (1966). The parliamentary leper : colour & British politics (2nd ed.). D.R. Prem
Ashish Rajadhyaksha, & Willemen, P. (1999). Encyclopaedia of Indian cinema. Oxford University Press.
प्रेम, डॉक्टर धनीराम. (1930). डोरा, भविष्य. इलाहाबाद: चाँद प्रेस.
प्रेम, डॉ धनीराम. (1932). मेरा साहित्यिक जीवन. आत्मकथा अंक, हंस.
[विश्व हिंदी पत्रिका, विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस]
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