भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है | हरिवंशराय बच्चन | हिंदी काव्य | Hindi Poetry by Harivansh Rai Bachchan

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊं किसके हित चंचल? -
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

- हरिवंश राय बच्चन
  हरिवंश राय बच्चन की कविताएं

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