राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

डर भी पर लगता तो है न

रचनाकार: दिविक रमेश
रेटिंग: 0/5 (0 मत)

डर भी पर लगता तो है न | बाल कविता

चटख मसाले और अचार
कितना मुझको इनसे प्यार!
नहीं कराओ  इनकी   याद
देखो  देखो  टपकी  लार।

माँ कहती पर थोड़ा  खाओ
हो   जाओगी  तुम बीमार
क्या करूं पर जी करता है
खाती  जाऊं  खूब  अचार।

पर डर भी लगता तो है न
सचमुच पड़ी  अगर बीमार
डॉक्टर जी कहीं पकड़ कर
ठोक न  दें  सूई दो-चार।

-दिविक रमेश

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।