
दक्षिण प्रशांत की बात करें तो फीजी में सबसे पहले 1897 में हिंदी की कक्षाएँ आरंभ हुई तो न्यूज़ीलैंड में 1945 के आसपास हिंदी विद्यालय की स्थापना हुई। ऑस्ट्रेलिया में हिंदी की पहली उपस्थिति 1953 में दर्ज होने के प्रमाण मिलते हैं।
फीजी में सबसे पहले हैना डडली ने 1897 में एक विद्यालय की शुरुआत की, जिसमें वे हिंदी और उर्दू की अनौपचारिक कक्षाएं लेती थीं। हैना डडली एक ऑस्ट्रेलियाई मेथोडिस्ट मिशनरी थीं, जो 1897 में भारत-फीजियाई समुदाय के बीच काम करने और उनके अधिकारों की आवाज़ उठाने के लिए फीजी आई थीं।
फीजी में बरगद के पेड़ के नीचे हिंदी-उर्दू कक्षाएँ
1897 में उन्होंने सुवा में एक बरगद के पेड़ के नीचे गिरमिटिया भारतीय मजदूरों के बच्चों के लिए हिंदी और उर्दू में अनौपचारिक कक्षाएं लेना शुरू किया। यही साधारण सी शुरुआत आगे चलकर 'डडली हाउस स्कूल' (और बाद में 'डडली हाई स्कूल') बनी, जिसने सुवा क्षेत्र में भारतीय लड़कियों और बच्चों के लिए शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण की नींव रखी।
बद्रीनाथ (बद्री) महाराज का विद्यालय
पंडित बद्री महाराज का जन्म 1868 में उत्तराखंड के बमोली गाँव में हुआ था। बद्री महाराज 1889 में भारत से एक गिरमिटिया मजदूर के रूप में फीजी आए थे, जो आगे चलकर एक सफल किसान, सामाजिक नेता और फीजी की विधान परिषद (लेजिस्लेटिव काउंसिल) के पहले भारत-फीजियाई सदस्य बने।
1898 में पंडित बद्री महाराज ने अपने निजी प्रयासों से राकिराकि के पास 'वायरुकु इंडियन स्कूल' (जिसे अब 'वायरुकु प्राइमरी स्कूल' कहा जाता है) की स्थापना की। इस संस्थान को व्यापक रूप से फीजी में भारतीय समुदाय के लिए स्थापित पहला औपचारिक स्कूल माना जाता है। वायरुकु स्कूल के शुरुआती छात्रों में रतुकु सिर लाला सुकुना भी शामिल थे, जो बड़े होकर फीजी के सबसे प्रमुख राजनेता बने।
न्यूज़ीलैंड : फीजी के शिक्षक ने आरंभ किया न्यूज़ीलैंड में हिंदी शिक्षण
1945 के आसपास पंडित अमीचन्द विद्यालंकार ने ऑकलैंड में 'हिंदी शिक्षण' आरंभ किया था। पंडित अमीचन्द विद्यालंकार मूलतः भारत से थे लेकिन फीजी में बसे हुए थे। वे कुछ वर्ष अपनी उच्च शिक्षा के लिए ऑकलैंड में रहे और इसी समय भारतीय समुदाय के अनुरोध पर उन्होंने यहाँ हिंदी शिक्षण आरंभ किया। यह प्रयास बहुत्त लंबे समय तक नहीं चल सका लेकिन हिंदी शिक्षण का बीजारोपण यहीं से हुआ। पंडित अमीचन्द इससे पहले फीजी में अनेक सफल शैक्षणिक प्रयोग कर चुके थे। उन्होंने 1938 में ‘बा’ जिले के Yalalevu में आर्य कन्या पाठशाला जैसे ऐतिहासिक विद्यालय की स्थापना की। यह संस्थान विशेष रूप से भारतीय मूल की बच्चियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। पंडित जी स्वयं इसके पहले प्रधानाचार्य बने और बालिकाओं के लिए विद्या के द्वार खोले।
इसके अतिरिक्त रात्रिकालीन पाठशालाओं (Night Schools) का संचालन केआर चुके थे। इसकी स्थापन दिनभर खेतों और मजदूरी करने वाले वयस्क पुरुषों को साक्षर बनाने के लिए रात्रिकालीन कक्षाएँ शुरू की गईं त्थिन, जिससे समाज का हर वर्ग अक्षर-ज्ञान से जुड़ सका। पंडित जी को हिंदी पाठ्यक्रम निर्माण का भी अनुभव था जो न्यूज़ीलैंड के लिए भी लाभकारी।
अपने न्यूज़ीलैंड प्रवास के दौरान पंडित जी ने ऑकलैंड में 'हिंदी शिक्षण’ की नींव डाली।
ऑस्ट्रेलिया में संडे स्कूल और क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में हिंदी का शुरुआती दौर
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी की पहली उपस्थिति—चाहे अनौपचारिक ही सही—कैनबरा में 1953 के आसपास देखी जा सकती है। कमला रत्नम (1914-1991) ने कैनबरा में हिंदी कक्षाएँ आरंभ कीं।
यही अनौपचारिक उपस्थिति आगे चलकर सप्ताहांत हिंदी विद्यालयों विशेषतः रविवारीय हिंदी स्कूल की नींव प्रमाणित हुई।
यह पहल संस्थागत नहीं थी, बल्कि पूर्णतः स्वैच्छिक और सामुदायिक थी। कमला रत्नम ने सुनिश्चित किया कि राजनयिक परिवारों और स्थानीय भारतीय प्रवासियों के बच्चे अपनी जड़ों से न कटें। उन्होंने दिवाली और स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसरों पर बच्चों द्वारा हिंदी नाटक और गीतों के मंचन को प्रोत्साहित किया। उनके द्वारा तैयार करवाए गए बच्चों के नाटक और अन्य कार्यक्रमों का मंचन उनके ऑस्ट्रेलिया से चले जाने के बाद भी होता रहा। कमला रत्नम वहाँ के स्थानीय लोगों को भी प्राय संबोधित करती रही हैं। वे उस समय की चर्चित महिला रही हैं।
उन्हीं का चलाया हुआ रवीवारीय बाद में 'संडे स्कूल' मॉडल के रूप में ऑस्ट्रेलिया के अन्य शहरों में स्थापित हिंदी स्कूलों के लिए एक खाका (Blueprint) साबित हुआ।
कमला रत्नम एक "महान संस्कृत विदुषी" (Great Sanskrit Scholar) थीं। उन्होंने 1937 में लखनऊ विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में एम.ए. किया और स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। वह हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच, जर्मन और रूसी भाषाओं की भी जानकार थीं। कमला रत्नम उच्चायोग के वरिष्ठ अधिकारी की पत्नी थीं। पेराला रत्नम वारिष्ठ राजनयिक पद पर थे।वह 1953 से 1958 के बीच कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) में रहीं।
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी की शुरुआत किसी एक केंद्र से नहीं, बल्कि दो समानांतर धाराओं से हुई—एक कूटनीतिक-सामुदायिक (कैनबरा) और दूसरी अकादमिक (क्वींसलैंड)।
क्वींसलैंड विश्वविद्यालय और 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ मॉडर्न लैंग्वेजेज़'
क्वींसलैंड विश्वविद्यालय से संबद्ध 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ मॉडर्न लैंग्वेजेज़' (IML-UQ) की स्थापना 1934 में हुई थी, और यह आज भी 30 से अधिक भाषाओं में पाठ्यक्रम चलाने वाला ब्रिस्बेन का एक प्रमुख भाषा-संस्थान है। इसी संस्थान के सांध्यकालीन विद्यालय (evening school) में 1954 में हिंदी को शामिल किया गया।
समस्या स्पष्ट थी—योग्य हिंदी-शिक्षक कहाँ से लाया जाए? उस दौर में ऑस्ट्रेलिया में स्थायी रूप से बसे भारतीयों की संख्या नगण्य थी, और पेशेवर हिंदी-अध्यापकों का तो सवाल ही नहीं उठता था। इसी कमी के बीच संस्थान की नज़र भारत से इंजीनियरिंग में ऑनर्स की पढ़ाई करने आए एक छात्र—प्रकाश चंद्र जैन—पर पड़ी, और उन्हें हिंदी व्याख्याता (Lecturer) नियुक्त कर दिया गया।
प्रकाश चंद्र जैन एक इंजीनियरिंग छात्र जो परिस्थितिवश हिंदी-शिक्षक बन गया और कमला रत्नम—एक राजनयिक की पत्नी जिसने अपने घर से ही एक भाषा-आंदोलन की नींव रखी—दोनों कहानियाँ मिलकर यह याद दिलाती हैं कि भाषाओं का इतिहास अक्सर बड़े संस्थानों की सूचियों में नहीं, बल्कि साधारण लोगों के असाधारण संकल्प में दर्ज होता है।
-रोहित कुमार हैप्पी
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