अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

छवि नहीं बनती

छवि नहीं बनती - सपना सिंह ( सोनश्री ) | Poem by Sapana Singh

निराला पर सपना सिंह (सोनश्री) की कविता

निराला जी, निराले थे।
इसलिए तो,
सबको, भाये थे।
आपके, शब्दों में,
जादू था ऐसा,
कि
आज भी,
गूंजते हैं वही,
जेहन में,
बार बार,
कर्नाकाश के,
अक्षय पटल पर ।
अभाव में,
भाव,
आये थे कैसे ?
आज तो,
भाव में भाव,
आता नहीं ।
सोचती हूँ ,
कहाँ से,
उमड़ेगी कविता,
जिसमें,
झलकेगी,
छवि आपकी ।
क्या कहूँ,
शब्द,
नहीं बनते,
भाग, जाते हैं,
आपके,
नाम से, शब्दों के,
चमत्कार से
निराला जी, निराले थे,
इसलिए तो,
सबको,
भाये थे आप ।

- सपना सिंह ( सोनश्री )
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