यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

भारतीय | फीज़ी पर कविता

भारतीय | फीज़ी पर जोगिन्द्र सिंह कंवल की कविता | Poem by Joginder Singh Kanwal on Fij

लम्बे सफर में हम भारतीयों को
कभी पत्थर कभी मिले बबूल

कभी मिट जाती कभी जम जाती
इतिहास के दर्पण पर धूल

जिस देश को अपनाया हमने
वह टूट रहा फिर एक बार

चमन यह बिगड़ा इस तरह
काँटे बन रहे सारे फूल

- जोगिन्द्र सिंह कंवल, फीजी

 

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