अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

बन्दर मामा

रचनाकार: डॉ रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav
रेटिंग: 0/5 (0 मत)

बन्दर मामा | Hindi poem for Children

पहन नया कुर्ता-पजामा,
निकले घर से बन्दर मामा।
चले जा रहे रौब दिखाते,
पैर पटकते, गाल फुलाते।

कहा किसी ने नेताजी हैं,
अजी नहीं, अभिनेता ही हैं।
नाम सदाचारी है इनका
काम अदाकारी है इनका।

रंग बदलने में ये माहिर,
रूप बदले में जग-जाहिर।
गांधी-भक्त कहाते हैं ये,
देश लूटकर खाते हैं ये।

सुनसुनकर ये तीखी बातें,
सो न सके वह कितनी रातें।
अब तो मैं कुर्ता-पजामा,
कभी न पहनूं बोले मामा।

--डॉ रामनिवास मानव

 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।