हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। - बेरिस कल्यएव

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे | ग़ज़ल

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे | Ghazal by Ramdarsh Mishra

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे धीरे

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे धीरे

जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे धीरे

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यूँ ही सर धीरे धीरे

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे धीरे

-रामदरश मिश्र

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।