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बाबा | हास्य कविता

बाबा | हास्य कविता | Hasya Kavita by Rohit Kumar Happy

दूर बस्ती से बाहर
बैठा था एक फ़क़ीर
पेट से भूखा था
तन कांटे सा सूखा था।

बस्ती में फ़क़ीर की ऐसी हवा है
कहते हैं -
बाबा के पास हर मर्ज़ की दवा है।

आस-पास मिलने वालों की भीड थी
कोई लाया फूल, किसी के डिब्बे मे खीर थी।

फ़क़ीर से माँग रहे थे वे सब
जिनके मोटे-मोटे पेट थे
देखने में लगते सेठ थे।

बाबा के आगे शीश नवाते थे
फल, फूल, मेवे चढ़ाते थे
बदले में जाने क्या चाहते थे!

बाबा अपनी धुन में मस्त
कभी-कभी आँख उठाते थे,
'इनका पेट ना भरा, ना भरेगा'
सोचकर मुसकाते थे
फिर अपने आप में खो जाते थे।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

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