राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

आशापञ्चक

आशापञ्चक | Hindi poem by Babu Gulabrai

आशा वेलि सुहावनी. शीतल जाको छांहि ।
जिहि प्रिय सुमन सुफलन ते, मधराई अधिकाहिं

आशा दीपक करत नीत, जिहि हिरदे में बास
ज्यों ज्यों छावे तिमिर घन, त्यों त्यों बड़े प्रकास

मानव-जीवन को सुखद, सरस जु देत बनाइ
सो आशा संजीवनी, किहि हत-भाग न भाइ

होहु निरासन हार में, धन्य लच्छ निज मान
तोमे ईश्वर अंश को, देत जु प्रकट प्रमान

मीत न होहु निराश अब, लखि समाज को हास
मधुऋतु आगम सूचहीं, पतझड़ फागुन मास

-गुलाबराय

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।