देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

आरजू

इंतजार की आरजू अब नहीं रही
खामोशियों की आदत हो गई है,
न कोई शिकवा है न शिकायत
अजनबियों सी हालत हो गई है।

चुभती रहती चाँदनी
बड़ी कठिन ये रात हो गई है,
एक तेज हूक उठती है मन में मेरे
खुशी भी इतेफाक हो गई है।

अब है तो सिर्फ तन्हाई
जो एकांत भरी भीड़ दे गई है,
न जाने हैं ये अश्क कैसे बावरे
जो बिन बादल बरसात दे गई है।

बिन तेरे,
उदासी है छाई
जिंदगी मेरी
एक बनवास हो गई है।

-शुभाशनी लता कुमार
फीजी

 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।