कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली 'मीर'।

अपना घर

अपना घर | Apna Ghar - Hindi Story by Rohit Kumar Happy

पहचान, अपनापन और 'घर' की परिभाषा के इर्द-गिर्द बुनी यह संवेदनशील रचना छोटे-छोटे संवादों और रोज़मर्रा के दृश्यों के ज़रिए एक गहरी भावनात्मक सच्चाई को उभारती है। रोहित कुमार हैप्पी की 'अपना घर' कहानी प्रवासी भारतीयों की उस साझी पीड़ा को छूती है, जहाँ वे न पूरी तरह अपनाए गए देश के हो पाते हैं, न अपने मूल देश के। दोनों जगह वे कहीं-न-कहीं 'अतिथि' या 'अजनबी' महसूस करते हैं। यह पीड़ा सार्वभौमिक प्रवृत्ति है, पर इसका अनुभव व्यक्तिगत है। 

(1)

उसे अपना देश छोड़े तीन दशक से ज़्यादा हो चुके थे। बच्चे यहीं जन्मे, पले-बढ़े और अब अपने पैरों पर खड़े थे। एक प्रेम करने वाली पत्नी थी, शहर के सबसे अच्छे इलाक़े में ख़ूबसूरत घर था, पर कभी-कभी उसका मन उचाट हो जाता। आज की सुबह भी कुछ ऐसी ही थी, जब उसका अपना घर उसे सिर्फ़ एक 'मकान' लगने लगा और यह देश बेगाना।

सुबह तो सब ठीक था। वह रोज़ की तरह 'स्विमिंग पूल' में तैरने गया था। लौटकर उसने एक केला, एक कीवी, कुछ अंगूर और मेवे ब्लेंडर में डाले, थोड़ा पानी और शहद मिलाकर अपनी पसंदीदा स्मूदी बनाई। स्मूदी का गिलास लेकर वह बाग़ीचे की आरामकुर्सी पर बैठ गया। पर आज तो स्मूदी का स्वाद भी कसैला लग रहा था। दोष स्मूदी का नहीं, उस सवाल का था जो 'पूल' पर एक अजनबी लड़के ने उससे पूछा था, "You speak good English. How long have you been in this country?" (आप अच्छी अंग्रेज़ी बोलते हैं। आप इस देश में कब से हैं?)

"छत्तीस साल," वह मन ही मन बुदबुदाया। "मेरी उम्र का आधे से ज़्यादा हिस्सा... शायद उस लड़के की पूरी उम्र से भी ज़्यादा!" एक पल में उसके छत्तीस साल की नागरिकता, उसकी पहचान, उस लड़के के एक सवाल से कागज़ की नाव बनकर डगमगाने लगी थी।

शाम को पत्नी रश्मि जब घर आई तो रवि का उतरा हुआ चेहरा देखते ही पूछ बैठी, "क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है?"

"हाँ, कुछ नहीं! मैं ठीक हूँ।" उसने रश्मि से सच छिपाने की कोशिश की, पर नज़रें नहीं मिला पाया।

रश्मि ने उसे एक पल को देखा और फिर से पूछा, "नहीं, कुछ तो हुआ है।"

वह ख़ामोश रहा।

"चाय बनाऊँ?"

"हम्म।" उसने बस इतना ही कहा।

चाय पर भी ख़ामोशी छाई रही। रश्मि को बार-बार कुरेदने की आदत नहीं थी, इसलिए बात वहीं दबी रह गई।

 

(2)

रात को खाने के बाद कुछ देर बातें हुईं और फिर दोनों सोने चले गए। रश्मि को सोने से पहले कुछ पढ़ने की आदत थी, और रवि बिस्तर पर लेटते ही सो जाता था। पर आज उसे नींद नहीं आ रही थी। वह बस चुपचाप छत को घूर रहा था।

रश्मि की निगाह रवि पर पड़ी तो उसने किताब बंद करते हुए पूछा, "क्या बात है, आज सोए नहीं?"

"बस... नींद नहीं आ रही।"

टेबल लैम्प की हल्की रोशनी में रश्मि ने उसके चेहरे पर तैरती चिंता को पढ़ लिया। उसने किताब एक ओर रखी और रवि का हाथ अपने हाथ में ले लिया। "रवि, आज हुआ क्या है, बताओगे नहीं?"

"कु... कुछ नहीं तो।"

"सोच रहा था, इंडिया हो आऊँ।" आख़िरकार रवि ने कह ही दिया।

"तो हो आओ, इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है?" रश्मि ने सहजता से कहा, पर फिर उसकी आँखों में झाँकते हुए बोली, "तुम्हारे इंडिया जाने का फ़ैसला आज सुबह की किसी बात से जुड़ा है, है न?"

उसने प्यार से रवि के माथे को सहलाया। रवि की आँखें भीग आईं। वह चाहकर भी रश्मि से कभी कुछ नहीं छिपा पाया था। रश्मि जैसे किताबें पढ़ती थी, वैसे ही उसका चेहरा भी पढ़ लेती थी। उसने सुबह पूल वाली पूरी घटना कह सुनाई।

रश्मि ने एक पल सोचा और बोली, "चलो, हम दोनों इंडिया चलते हैं। मुझे भी माँ-बाबा की याद आ रही है।"

दोनों के पास पाँच साल का वीज़ा था ही। बस टिकट बुक करवानी थी। नवंबर के अंत में भारत की उड़ान तय हो गई।


(3)

रवि ने भारत में अपने किराएदार राघव बाबू को फ़ोन करके घर साफ़ करवाने को कह दिया था। राघव बाबू किराएदार कम, परिवार का हिस्सा ज़्यादा थे। नीचे का हिस्सा रवि-रश्मि ने अपने लिए रखा था और ऊपर वे रहते थे। जब मन करे, चले जाओ।

दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही एक जानी-पहचानी सी हवा ने उनका स्वागत किया। रश्मि ने झट से एयरपोर्ट के वॉशरूम में जाकर कपड़े बदल लिए। नीली साड़ी में वह बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी।

"बहुत सुंदर लग रही हो," रवि ने उसे देखकर कहा।

"थैंक यू। आप भी खादी की इस शर्ट में पूरे सुसंस्कृत भारतीय लग रहे हैं," रश्मि मुस्कुराई।

उन्होंने ऑनलाइन प्री-पेड टैक्सी बुक कर ली थी। यूँ तो चचेरे-ममेरे भाई हमेशा लेने आ जाते थे, पर रवि को किसी को तकलीफ़ देना पसंद नहीं था। कुछ ही मिनटों में वे टैक्सी में बैठकर अंबाला की ओर बढ़ रहे थे।

टैक्सी ड्राइवर काफ़ी मिलनसार था। "आप लोग बाहर रहते हैं क्या, साहब?" उसने पूछा।

"जी, मुझे छत्तीस साल हो गए और मेरी पत्नी को तीस साल।"

"अमेरिका में?"

"नहीं, न्यूज़ीलैंड में।"

"ओह, न्यूज़ीलैंड! जहाँ वो सबसे पहले हिमालय पर चढ़ने वाले साहब थे... एडमंड हिलेरी!"

"अरे वाह! आप तो जानते हैं," रवि को सुखद आश्चर्य हुआ।

"क्यों नहीं जानेंगे, जी! स्कूल में पढ़ा था उनके बारे में। और यह भी कि वहाँ भेड़ें बहुत होती हैं।"

"आपको तो काफ़ी कुछ पता है," रश्मि ने भी बातचीत में हिस्सा लिया।

बातों-बातों में अंबाला कब आ गया, पता ही नहीं चला। घर के पास पहुँचकर ड्राइवर ने कहा, "आप दोनों को देखकर ही मुझे अंदाज़ा हो गया था कि आप लोग काफ़ी समय से बाहर रहते हैं।"

"वह कैसे?" रश्मि ने उत्सुकता से पूछा।

"मैडम जी, आपने साड़ी पहनी है और साहब ने खादी। यहाँ अब रोज़-रोज़ ये सब कौन पहनता है! ये तो परदेस में रहने वाले ही अपने देश की याद में पहनते हैं।"

ड्राइवर की यह बात रवि और रश्मि के दिलों में उतर गई। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। उस एक नज़र में हज़ारों अनकहे शब्द थे।

"आइए, हमारे साथ चाय पीकर जाइएगा," रवि ने आग्रह किया।

"नहीं साहब, शुक्रिया। अब मुझे भी वापस 'घर' पहुँचना है।" उसने मुस्कुराकर कहा और फिर जाते-जाते पूछ लिया, "कितने दिन की छुट्टी आए हैं?"

'छुट्टी'... यह एक शब्द रवि के अंदर तूफ़ान उठा गया। ड्राइवर अपने 'घर' जा रहा था और वह अपने ही देश में 'छुट्टी' पर आया एक मेहमान था। उसे अचानक एहसास हुआ कि इतने सालों में उसने दो शहरों में मकान तो बना लिए, पर शायद 'अपना घर' कहीं पीछे छूट गया था। वह उस देश में पराया था और अपने देश में मेहमान।

—रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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