भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

अंततः

अंततः | Hindi poem by Jaipraksh Manas

बाहर से लहूलुहान
आया घर
मार डाला गया
अंततः

-जयप्रकाश मानस
[ अबोले के विरुद्ध, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली ]

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।