हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

आज ना जाने क्यों

आज ना जाने क्यों फिर से
याद आ गया
नानी का वह प्यार और दुलार।

भीतर के कोठारे में
ना जाने कब से छुपा कर रखी मिठाई
हमारे स्वागत के लिये।

धोती के पल्ले में बंधे कुछ सिक्के।

आँखों में भारी असीम ममता
एक बार फिर मिल लेने की चाह।

अनगिनत दुआओँ से भरा
उनका वह झुर्रियों भरा हाथ।

अगली गर्मियों की छुट्टियों में
फिर से आने का वह न्यौता।

सभी कुछ तो याद है मुझे।
बस एक बार
आँख बंद करने की ही तो देर है!

डॉ॰ पुष्पा भारद्वाज-वुड
न्यूज़ीलैंड

 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 1

A
Anami Bhargava anamibhargava@gmail.com
16-May-2020 02:07
Na Jane kyun kavita man ko chu Gaye. Hamari Nani jinhe ham mati Kahte the yaad taja ho aayee. Dr. Pushpa bhardwaj wood ko dhanyavad

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