देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

तुम मेरी बेघरी पे...

रचनाकार: ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
रेटिंग: 0/5 (0 मत)

तुम मेरी बेघरी पे बड़ा काम कर गए
कागज का शामियाना हथेली पर धर गए

बोगी में रह गया हूं अकेला मैं दोस्तो!
एक एक करके सारे मुसाफिर उतर गए

गरमी में खोलते थे जो पानी की गुमटियां
तिश्नालबो! वो लोग न जाने किधर गए

यारो, सियासी शहर की इतनी-सी बात है
नकली मुकुट लगा के सभी बन-संवर गए

अक्वेरियम में डाल दीं जब मछलियां तमाम
तो यूं लगा कि सारे समंदर ठहर गए

-ज्ञानप्रकाश विवेक

 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।