देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल
पुराने ख़्वाब के फिर से नये साँचे बदलती है
सियासत रोज़ अपने खेल में पाले बदलती है
हम ऐसे मोड़ पर आ कर अचानक टूट जाते हैं
जहाँ से ज़िन्दगी अपने कई रस्ते बदलती है
हमेशा एक सा चेहरा बहुत कम लोग रखते हैं
यहाँ इंसान की फ़ितरत कई चेहरे बदलती है
हवा में भीगते हैं बारिशों में सूख जाते हैं
मुहब्बत मौसमों का रूख़ सलीक़े से बदलती है
हमे ग़ुरबत से बाहर आने का मौक़ा नहीं मिलता
कोई साज़िश हमारे घर के दरवाज़े बदलती है
- कृष्ण सुकुमार
153-ए/8, सोलानी कुंज,
भारतीय प्रौद्योकी संस्थान
रुड़की- 247 667 (उत्तराखण्ड)
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