यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

जितने पूजाघर हैं | ग़ज़ल

रचनाकार: राजगोपाल सिंह
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जितने पूजाघर हैं - राजगोपाल सिंह की ग़ज़ल | Hindi Ghazal by Rajgopal Singh

जितने पूजाघर हैं सबको तोड़िये
आदमी को आदमी से जोड़िये

एक क़तरा भी नहीं है ख़ून का
राष्ट्रीयता की देह न निचोड़िये

स्वार्थ में उलझे हैं सारे रहनुमां
इनपे अब विश्वास करना छोड़िये

घर में चटखे आइने रखते कहीं
दूर जाकर फेंकिये या फोड़िये

इक छलावे से अधिक कुछ भी नहीं
कुर्सियों की ये सियासत छोड़िये

- राजगोपाल सिंह

 

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