हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

मैं कहानी कैसे लिखता हूँ | आलेख

रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद
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मैं कहानी कैसे लिखता हूँ

मेरे किस्से प्राय: किसी-न-किसी प्रेरणा अथवा अनुभव पर आधारित होते हैं, उसमें मैं नाटक का रंग भरने की कोशिश करता हूँ मगर घटना-मात्र का वर्णन करने के लिए मैं कहानियाँ नहीं लिखता। मैं उसमें किसी दार्शनिक और भावनात्मक सत्य को प्रकट करना चाहता हूँ। जब तक इस प्रकार का कोई आधार नहीं मिलता, मेरी कलम ही नहीं उठती। आधार मिल जाने पर मैं पात्रों का निर्माण करता हूँ। कई बार इतिहास के अध्ययन से भी प्लाट मिल जाते हैं लेकिन कोई घटना कहानी नहीं होती, जब तक कि वह किसी मनोवैज्ञानिक सत्य को व्यक्त न करे।

मैं जब तक कोई कहानी आदि से अन्त तक जेहन में न जमा लूं, लिखने नही बैठता। पात्रों का निर्माण इस दृष्टि से करता हूँ कि वे इस कहानी के अनुकूल हों। मैं इसकी जरूरत नहीं समझता कि कहानी का आधार किसी रोचक घटना को बनाऊं मगर किसी कहानी में मनोवैज्ञानिक पराकाष्ठा (Climax) हो, और चाहे वह किसी भी घटना से सम्बन्धित हो, मैं इसकी परवाह नहीं करता। अभी मैंने हिन्दी में एक कहानी लिखी है, जिसका नाम है, 'दिल की रानी'। मैंने मुस्लिम इतिहास में तैमूर के जीवन की एक घटना पढ़ी थी, जिसमें हमीदा बेगम से उसके विवाह का उल्लेख था। मुझे तुरन्त इस ऐतिहासिक घटना के नाटकीय पहलू का ख्याल आया। इतिहास में क्लाइमैक्स कैसे उत्पन्न हो, इसकी चिन्ता हुई। हमीदा बेगम ने बचपन में अपने पिता से शस्त्र-विद्या सीखी थी और रणभूमि में कुछ अनुभव भी प्राप्त किए थे। तैमूर ने हजारों तुर्कों का वध किया था। ऐसे प्रतिपक्षी पर एक तुर्क स्त्री किस प्रकार अनुरक्त हुई, इस समस्या का हल होने से क्लाइमैक्स निकल आता था। तैमूर रूपवान न था, इसलिए जरूरत हुई कि उसमें ऐसे नैतिक और भावनात्मक गुण उत्पन्न किए जाएं, जो एक श्रेष्ठ स्त्री को उसकी ओर खींच सकें। इस प्रकार वह कहानी तैयार हो गई।

कभी-कभी सुनी-सुनाई घटनाएं ऐसी होती हैं कि उन पर आसानी से कहानी की नींव रखी जा सकती है। कोई घटना, महज सुन्दर और चुस्त शब्दावली और शैली का चमत्कार दिखाकर ही कहानी नहीं बन जाती; मैं उसमें क्लाइमैक्स लाज़िमी चीज़ समझता हूँ, और वह भी मनोवैज्ञानिक। यह भी जरूरी है कि कहानी इस क्रम से आगे चले कि क्लाइमैक्स निकटतम आता जाए। जब कोई ऐसा अवसर आ जाता है, जहां तबीयत पर जोर डालकर साहित्यिक और काव्यात्मक रंग उत्पन्न किया जा सकता है, तो मैं उस अवसर से अवश्य लाभ उठाने का प्रयत्न करता हूँ। यही रंग कहानी की जान है।

मैं कम भी लिखता हूँ। महीनेभर में शायद मैंने कभी दो कहानियों से अधिक नहीं लिखी। कई बार तो महीनों कोई कहानी नहीं लिखता। घटना और पात्र तो मिल जाते हैं; लेकिन मनोवैज्ञानिक आधार कठिनता से मिलता है। यह समस्या हल हो जाने के बाद कहानी लिखने में देर नहीं लगती। मगर इन थोड़ी सी पंक्तियों में कहानी-कला के तत्व वर्णन नहीं कर सकता। यह एक मानसिक वस्तु है। सीखने से भी लोग कहानीकार बन जाते हैं, लेकिन कविता की तरह इसके लिए भी, और साहित्य के प्रत्येक विषय के लिए, कुछ प्राकृतिक लगाव आवश्यक है। प्रकृति आपसे-आप प्लाट बनाती है, नाटकीय रंग पैदा करती है, ओज लाती है, साहित्यिक गुण जुटाती है, अनजाने आप ही आप सब कुछ होता रहता है। हाँ, कहानी समाप्त हो जाने के बाद मैं खुद उसे पढ़ता हूँ। अगर उसमें मुझे नयापन, बुद्धि का कुछ चमत्कार, कुछ यथार्थ की ताजगी, कुछ गति उत्पन्न करने की शक्ति का एहसास होता है तो मैं उसे सफल कहानी समझता हूँ वरना समझता हूँ फेल हो गया। फेल और पास दोनों कहानियां छप जाती हैं और प्राय: ऐसा होता है कि जिस कहानी को मैंने फेल समझा था, उसे 'मित्रों' ने बहुत सराहा। इसलिए मैं अपनी परख पर अधिक विश्वास नहीं करता।

- प्रेमचंद

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