हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

स्वर किसका?

ईश्वर की खोज करते-करते हारकर जीव ने कहा - बड़ी मूर्खता की मैंने जो उस निराकार को पाने की आशा से अब तक भटकता फिरा ।

तभी उसे सुनाई दिया - पगले, तेरे खोज में लगने के पूर्व से ही मैं तेरे साथ हूं । तुझे फुर्सत भी तो मिले मुझे देखने की !

और जीव ईश्वर को सुनता तो है, पर पहचानता नहीं । वह आज भी चकित होकर सोचता है यह स्वर किसका है!

- डॉ प्रेम नारायण टंडन

 

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