देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
सुबह-सवेरे
किरणों की अंगड़ाई जैसे
पौ यूं फट फट आई जैसे
रात की चीं-चीं चुप्पी साधी
भोर भी यूं बौराई जैसे
पाखी शोर मचाने वाले
उनकी तो बन आई जैसे
हवा बहे हौले-हौले से
अभी नई हो आई जैसे
रात का यौवन भाया उसको
कली फूल बन आई जैसे
ओस की बूँदें मोती बनकर
तडके दूध-नहाई जैसे
रात के भारी कठिन पलों की
भोर में हुई रिहाई जैसे
जैसी मैंने आँखों देखीं
वैसी तुम्हे बताई जैसे
-राजबीर देसवाल
ई-मेल: rajbirdeswal@hotmail.com
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