हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
रुदन करता पेड़ | कविता
मैंने पेड़ को रोते देखा
उसका सब कुछ खोते देखा।
भुजा समान उसकी डाली को
उससे अलग होते देखा।
सिसकी हर पत्ता भरता है
मुंह से 'आह' भी ना करता है।
जडों से आंसू बहते हैं
दुख की कहानी कहते हैं।
अब तो छोड़ो हमें सताना
अब ना मिलेगा मौसम सुहाना।
अपने बच्चों के लिए मैंने,
मानव को, दुख का बीज
बोते देखा।
हां! मैंने पेड़ को रोते देखा
उसका सब कुछ खोते देखा।
-डॉ मुल्ला आदम अली
तिरुपति, आंध्र प्रदेश, भारत
ई-मेल : mullaadamali@gmail.com
वेबसाइट : https://www.drmullaadamali.com/
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