वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
नया साल : नया गीत
नये साल में गीत लिखें
कुछ नये भाव के ऐसे
हर शाखा पर पत्र-पुष्प नव
ऋतु बसंत में जैसे
ख़ुशियाँ हों हर घर आँगन में
प्रेम प्यार हो मन में
श्रद्धा भाव रहे पूजा में
धैर्य, ध्यान-चिंतन में
सोचें, दुखियों के दुख हम
कब मिल-बाँटेंगे, कैसे?
नये साल में ….
धर्म एक हो मानवता का
फूले फले निरन्तर
जाति-धर्म, नस्लों, रंगों का
रहे न कोई अंतर
कब तक मूक सहेंगे
भेदभाव का तांडव ऐसे
नये साल में …….
युवा बनें सुशिक्षित मानव
त्यागें भय-आडम्बर
रखें नियंत्रण खुद अपना
अपनी धरती, अम्बर पर
चढ़ें न मन पर रंग कभी
इस जग के ऐसे वैसे
नये साल में गीत लिखें
कुछ नये भाव के ऐसे ॥
-विनिता तिवारी, अमेरिका
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