हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

ख़्वाब छीने, याद भी... 

ख़्वाब छीने, याद भी सारी पुरानी छीन ली 
वक़्त ने हमसे हमारी हर कहानी छीन ली। 

पर्वतों से आ गई यूँ तो नदी मैदान में 
पर उसी मैदान ने सारी रवानी छीन ली। 

दौलतों ने आदमी से रूह उसकी छीनकर 
आदमी से आदमी की ही निशानी छीन ली। 

देखते ही देखते बेरोज़गारी ने यहाँ 
नौजवानों से समूची नौजवानी छीन ली। 

इस तरह से दोस्ती सबसे निभाई उम्र ने 
पहले तो बचपन चुराया फिर जवानी छीन ली।

-कमलेश भट्ट 'कमल' 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।