देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
जहाँ पेड़ पर...
जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे
हज़ारों तरफ से निशाने लगे
हुई शाम, यादों के इक गाँव से
परिन्दे उदासी के आने लगे
घड़ी-दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते-आते ज़माने लगे
कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं
दुकानें खुली, कारख़ाने लगे
वहीं ज़र्द पत्तों का क़ालीन है
गुलों के जहाँ शामियाने लगे
पढ़ाई-लिखाई का मौसम कहाँ
किताबों में ख़त आने-जाने लगे
--बशीर बद्र
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