वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
दो पल | गीत
दो पल को ही गा लेने दो ।
गाकर मन बहला लेने दो !
कल तक तो मिट जाना ही है;
तन मन सब लुट जाना ही है;
लेकिन लुटने से पहले तो
अपना रंग जमा लेने दो ।
दो पल को ही गा लेने दो।
गाकर मन बहला लेने दो!
फूल खिलखिला कर हँसते हैं,
फिर तो काँटे ही धँसते हैं;
काँटों से पहले फूलों को--
कुछ शृंगार सजा लेने दो ।
दो पल को ही गा लेने दो ।
गाकर मन बहला लेने दो!
जीवन क्या है? इक सपना है,
सपने में सब कुछ अपना है;
अपनेपन की इन घड़ियों में
लघु संसार बसा लेने दो ।
दो पल को ही गा लेने दो ।
गाकर मन बहला लेने दो !
- शिवशंकर वशिष्ठ
[साभार - गीली आँखें गीले गीत]
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