वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।

धन्यवाद ! गलियो, चौराहो

धन्यवाद !
गलियो, चौराहो।
हम अपने घर
लौट
चले हैं

कटते
अंग रंग
गंधों से
गड़े हुए
धरती में
आधे
खंभों की
गिनतियाँ घटाते
टूटी नसें
थकन से
बाँधे
धन्यवाद !
उल्लास उछाहो
हम अपने घर
लौट
चले हैं

घूँट लिए दिन चायघरों ने
कुचली
पहियों ने
संध्याएँ
परिचय में
बस
फली नमस्ते
जेब भर गईं
असफलताएँ
धन्यवाद !
मिलनातुर राहो
हम अपने घर
लौट
चले हैं

समारोह मेले
वरयात्रा
भीड भोज स्वागत
शहनाई
सभी जगह
पीछे चलती है
अर्थहीन
काली परछाईं
धन्यवाद !
उत्सवो, विवाहो
हम अपने घर
लौट
चले हैं

धन्यवाद !
गलियो, चौराहो

-भारत भूषण
[मेरे चुनिंदा गीत : भारत भूषण]

 

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