राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।' - अनंत गोपाल शेवड़े

बूढ़ा चेहरा

सालों से देखा
झुर्रियों के ताने-बाने में,
अनंत अनुभवों को समेटे,
बूढ़ों का वह धीर-गंभीर चेहरा।
जब छोटी थी मैं, तब भी
वैसा ही था,
और आज भी,
वैसा ही है।

उनके बालों की वह चमकीली सफ़ेदी,
जो शायद धूप की देन नहीं है।
उनकी वह धीमी चाल,
जो शायद उनकी मजबूरी ही है।
उनका अपने से ही कुछ-कुछ बड़बड़ाना,
जो शायद किसी से मन की बात,
न कह पाने की कमी ही है।

शून्य में ताकता उनका वह गुमसुम चेहरा,
जो शायद उनका अकेलापन ही है।
क्यों न उनका सुख-दुख बाँटे हम,
उनके अनुभवों को साझा करें हम,
उनके जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर,
उनका सहारा बनकर,
उनसे जीवन की अनमोल सीख पाकर,
उनके अंतिम पलों को यादगार बनाएँ हम!

--कोमल मैंदीरत्ता
ई-मेल: komal.mendiratta@nd.balbharati.org

 

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