वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

बॉस का बॉसनामा

बॉस बादल की तरह है...
किस पर तरस खाएगा...
और किस पर गरम होकर बरस जाएगा, कह नहीं सकते।

किसे बरस कर...
सराबोर करेगा,
किससे मुँह फेरकर इग्नोर करेगा... कह नहीं सकते।
 
बॉस... सॉस की तरह है...
सही मात्रा में उपयोग से स्वाद आएगा,
नहीं तो बॉस ऐसा जायका है जो वर्षों याद आएगा...
 
बॉस की धौंस जो सहा...
वह राग-मालकौंस हो जाएगा...
नहीं तो खामोश कर दिया जाएगा, और टॉस हो जाएगा...
 
यह मेरे अनुभव का बॉसनामा...
मैं तो अपना न सका...
आपका दिल चाहे तो आज़माना...
 
-अमलेन्दु अस्थाना
  ईमेल: amlendu.asthana@dbcorp.in

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