देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
बोलो फिर कैसे मुस्काएं
जब पलकें हों गीली-गीली
फिर मन को कुछ भी न भाए
कितनी भी कोशिश कर लें पर
बोलो फिर कैसे मुस्काएं।
पीड़ा जब अंतर्मन में हो
होता है सहज नहीं कुछ भी
कितना समझाऊं समझे न
कैसे खुद को अब समझाएं।
अब चांद सितारे लगते हैं
जैसे हों कोई बेगाने
अब रात चाँदनी भाये न
अब दिल को कैसे बहलाएं।
अब अपने और पराए की
पहचान बड़ी मुश्किल सी है
जब अपना ही दे ज़ख्म हमें
फिर बोलो किसको दिखलाएं।
होती है आँखों से बारिश
जैसे वर्षा ऋतु आई
अब किस कंधे पर सिर रखकर
हम अपनी पीड़ा बतलाएं।
-विजय कनौजिया
ई-मेल: vijayprakash.vidik@gmail.com
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