किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'।

बेटी

आक्रोश घेर रहा था दीवारों में...परन्तु दीवारे इतनी मज़बूत थी...कभी निकल ना पाओ...कभी रह ना पाओ!!
दर्द भी जेब में खनक रहा था, सर और शरीर दोनों टूटने को तैयार थे ...!

बहुत मज़ा आ रहा था अहंकार को....द्वेष को...क्लेश को। इंसान टूट चुका था..आँखे नम थी.. फिर वापस याद आयी बेटी...! ..और वो कमाने निकल पड़ा..

- केतन कोकिल
  ई-मेल: ketan.kokil@gmail.com

 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।