वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
बंदी पंछी | गीत
कब यह खुलेगी काली खिड़की, कब पछी उड़ जाएंगे
ऐसा मौसम कब आएगा उड़ उड़ कर जब गाएंगे !
इस पिंजरे की हर तीली सपने में आन जलाती है,
ध्यान से कब यह निकलेगी कब इससे रिहाई पाएंगे !
बरस रहे हैं आज तो हम पर ओले भी ओ' पत्थर भी,
छितिज में हैं कुछ छितरे बादल उमड़ के वे भी आयेंगे !
आयेंगे औ' छा जायेंगे आकाश के कोने कोने में,
पवन चलेगी ऐसी पंछी सब पिंजरे खुल जाएंगे !
-सैयद मुतलवी फ़रीदाबादी
प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0
टिप्पणी लिखें (Write a Comment)