राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।' - अनंत गोपाल शेवड़े

अनमोल सीख

घने-काले बादल
झूमती-गाती मतवाली हवा
मानो! पेड़ों को गुदगुदी कर जाती
खिलखिलाते हुए पेड़
उसे पकड़ने, उसके पीछे-पीछे
दूर तक दौड़े जाते, और
पकड़ न पाने पर
एक रूठे बच्चे की तरह
ख़ूब मचल-मचल कर
दाएँ-बाएँ अपना सिर हिलाते, और
बादलों की गड़गड़ाहट में
कुछ-कुछ कह जाते।

हवा फिर-फिर आती
उन्हें मनाने
और चुपचाप से उन्हें गुदगुदी कर
फिर दौड़ जाती।

खेलना-खिलखिलाना,
हँसना-मुसकराना,
रूठना-मनाना,
प्रकृति का यह प्यारा-सा खेल
जाने-अनजाने ही
ख़ुशियों की अनमोल सीख दे जाता
जीवन इन्हीं छोटी-छोटी ख़ुशियों का नाम है
काश, आज का इंसान समझ पाता!

--कोमल मेहंदीरत्ता
ई-मेल: komal.mendiratta@nd.balbharati.org

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।